भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३३६ | भैषज्यरत्नावली। | [अर्शोरोग- |
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पित्तश्लेष्मप्रशमनी कच्छूकण्डूरुजापहा ।
गुदजान्नाशयत्याशु योजिता सगुडाऽभया ॥ १६ ॥
चीतेकी जडकी छालको पीसकर उसका एक घड़ेके भीतर लेप करके उस घड़ेमें मट्ठा या दही भरकर पान करनेसे अर्शोरोग दूर होता है । हरडका चूर्ण और गुड दोनोंको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे पित्त-कफजन्य विकार, कच्छू, कण्डू और अर्शोरोग शीघ्र दूर होता हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥
सगुडां पिप्पलीयुक्तामभयां घृतभर्जिताम् ।
त्रिवृद्दन्तीयुतां वापि भक्षयेदानुलोमिकीम् ॥ १७ ॥
घीमें भूनीहुई हरडके चूर्ण और पीपलके चूर्ण अथवा निसोतके चूर्ण और दन्तीकी जडके चूर्णको गुडमें मिलाकर सेवन करनेसे वायुका अनुलोमन होता है ॥
तिलारुष्करसंयोगं भक्षयेदग्निवर्द्धनम् ।
कुष्ठरोगहरं श्रेष्ठमर्शसां नाशनं परम् ॥ १८ ॥
काले तिल और भिलावेके चूर्णको समान भाग लेकर भक्षण करनेसे अग्निकी वृद्धि होती है । कुष्ठ तथा अर्शोरोग नष्ट होता है ॥ १८ ॥
गोमूत्राध्युषितां दद्यात् सगुडां वा हरीतकीम् ।
पञ्चकोलयुतं वापि तक्रमस्मै प्रदापयेत् ॥ १९ ॥
रातको गोमूत्रमें हरडको भिगोकर दूसरे दिन प्रातःकाल पीसकर सेवन करनेसे अथवा पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता और सोंठ इनके चूर्णको मट्ठेमें मिलाकर देनेसे अर्शोरोग दूर होता है ॥ १९ ॥
मृल्लिप्तं सौरणं कन्दं पक्त्वाऽग्नौ पुटपाकवत् ।
दद्यात् सतैललवणैर्दुन्नाम्नां विनिवृत्तये ॥ २० ॥
एक जिमीकन्दको लेकर इसके ऊपर अच्छे प्रकार मिट्टीका पुटपाककी विधिसे लेप करके अग्निमें पकावे । फिर उसको तिलके तैल और सेंधेनमकके साथ भूनकर सेवन करनेसे अर्शोरोग दूर होता है ॥ २० ॥
स्विन्नं वार्त्ताकुफलं घोषायाः क्षारजेन सलिलेन ।
तद्घृतभृष्टं युक्तं गुडेनातृप्तितो योऽत्ति ॥ २१ ॥
पिबति च तक्रं नूनं तस्याश्वेवातिबद्धगुदजानि ।
यान्ति विनाशं पुंसां सहजान्यपि सप्तरात्रेण ॥ २२ ॥
तोईके क्षारको छः गुने जलमें २१ बार छानकर फिर उस क्षारजलम बैंगनको उत्तम प्रकारसे पकाकर फिर घीमें भून लेवे फिर उसमें कुछ पुरान