भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| चिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । | ३३७ |
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गुड मिलाकर जा अर्शारोगी भक्षण करे और ऊपरसे मट्ठा पीवे तो उसके अत्यन्त बढा हुआ सहज अर्शरोग सात दिनमें नष्ट होजाताहै ॥ २१ ॥ २२ ॥
चतुःपलं स्नुहीकाण्डं त्रिपलं लवणत्रयात् ।
वार्त्ताकुकुडवश्चार्काद्दष्टौ द्वे चित्रकात्पले ॥ २३ ॥
दग्ध्वा रसेन वार्त्ताकोर्गुडिका भोजनोत्तराः ।
भुक्त्वा भुक्तं पचत्याशु कासश्वासार्शसां हिता ॥
विषूचिकाप्रतिश्यायहृद्रोगशमनाश्च ताः ॥ २४ ॥
थूहरके वृक्षकी टहनी १६ तोले, काला नमक, सेंधानमक और विरियासंचर नमक ये प्रत्येक ४ तोल, काले बैगन १६ तोले, आककी जडकी छाल ३२ तोले और लालचीतेकी जड़ ८ तोले लेवे, सबको एकत्र दग्ध करके बैंगनके क्वाथमे खरल करके चनेके बराबर गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे भोजन करनेके पीछे एक एक गोली सेवन करनेसे खायाहुआ अन्न शीघ्र पच जाता है । ये गोलियाँ खाँसी, श्वास और अर्शरोगवालोंके लिये परम हितकारी हैं एवं विषूचिका, प्रतिश्याय और हृदयरोगको शमन करनेवाली हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥
रक्तार्शश्चिकित्सा ।
रक्तार्शांस्युपेक्षेत रक्तमादौ स्रवेद्भिषक् ।
दुष्टास्रे निगृहीते तु शूलानाहावसृग्गदाः ॥ २५ ॥
रक्तज बवासीरकी चिकित्सा करते समय वैद्यको चाहिये कि, प्रथमही स्रवते हुये रुधिरको नहीं रोके । कारण–दूषित रक्तको रोकनेसे शूल, आनाह और रक्त सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं ॥ २५ ॥
शक्रक्वाथः सविश्वो वा किंवा बिल्वशलाटवः ।
योज्या रक्तार्शसैस्तद्वज्ज्योत्स्निकामूललेपनम् ॥ २६ ॥
इन्द्रजौका क्वाथ सोंठका चूर्ण मिलाकर अथवा बेलगिरीका क्वाथ सोंठका चूर्ण डालकर पान करनेसे किंवा तोरईकी जड़का लेप करनेसे रक्तार्शरोग दूर होता है ॥ २६ ॥
नवनीततिलाभ्यासात् केशरनवनीतशर्कराभ्यासात् ।
दधिसरमथिताभ्यासाद् गुदजाः शाम्यन्ति रक्तवहाः॥२७॥
नैनी घी ( मक्खन ), तिल या नागकेशर, मक्खन और मिश्री अथवा मलाई-सहित मथे हुए मट्ठेको कुछ दिनोंतक सेवन करनेसे रुधिरकी बवासीर नष्ट होती है ॥ २७ ॥
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