भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 1416 में से

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३३८ भैषज्यरत्नावली । [ अर्शोग-

समङ्गोत्पलमोचाह्वतिरीटतिलचन्दनैः ।
छागक्षीरं प्रयोक्तव्यं गुदजे शोणितापहम् ॥ २८ ॥
लज्जावन्ती, नीलकमलकी जड़, मोचरस, लोध, काले तिल और लाल चन्दन इनके समान भाग मिश्रित कल्कके द्वारा सिद्ध कियाहुआ बकरीका दूध पान करनेसे रक्तज बवासीर दूर होती है ॥ २८ ॥

कोमलं नलिनीपत्रं पिष्ट्वा खादेत् सशर्करम् ।
प्रातराजं पयः पीत्वा रक्तस्रावाद्विमुच्यते ॥ २९ ॥
कमलनीके कोमल पत्तोंको पीसकर उसमें कुछ चीनी मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल बकरीके दूधके साथ पान करनेसे रक्तस्राव बन्द होता है ॥ २९ ॥

सशर्करं कृष्णतिलस्य कल्कं बास्तैः पयोभिः पिबति प्रभाते ।
सद्यो हरत्येव गुदोत्थरक्तं योगोऽयमित्थं गिरिशप्रयुक्तः ॥ ३० ॥
काले तिलोंके कल्कको मिश्री मिलाकर बकरीके दूधके साथ प्रातःकाल सेवन करनेसे गुदासे रक्तका स्राव होना तत्काल दूर होता है ॥ ३० ॥

कौटजं कल्कमादाय पिष्ट्वा तक्रेण बुद्धिमान् ।
पीत्वा रक्तार्शसो रक्तस्रुतिमाशु नियच्छति ॥ ३१ ॥
कुड़ेकी छालके चूर्णको मठेके साथ पीसकर सेवन करनेसे रक्तज बवासीरमें रक्तका गिरना शीघ्र बन्द होता है ॥ ३१ ॥

तण्डुलसलिलोपेत्तं कल्कमपामार्गजं पिबतः ।
क्षीरमनुवाप्यभीरोर्गुदजाः शाम्यन्ति रक्तवहाः ॥
दाडिमस्य रसः पेयः शर्करामधुरीकृतः ॥ ३२ ॥
चिरचिटेके कल्ककों चावलोंके पानीमें पीसकर पीनेसे अथवा शतावरके चूर्णको बकरीके दूधके साथ मिश्री डालकर अनारका रस पान करनेसे रक्तज बवासीर समूल नष्ट होते हैं ॥ ३२ ॥

कण्टकिफलान्तमुशलक्षारो गोरोचनाजलम् ।
लेपमात्रेण विस्राव्य रसान् हन्ति गुदाङ्कुरान् ॥ ३३ ॥
कटहलके फलके भीतरकी मूलके क्षारको गोरोचनके साथ जलमें पीसकर लेप करनेसे रक्तस्राव होकर रक्तज बवासीर नष्ट होती है ॥ ३३ ॥

भावितं रजनीचूर्णैः स्नुहीक्षीरे पुनः पुनः ।
बन्धनात् सुदृढं सूत्रं छिनत्त्यर्शो न संशयः ॥

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