भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३५३

इसी योगराजके प्रभावसे पूर्वकालमें अगस्त्यऋषिके और भीमसेनके भस्माग्नि उत्पन्न होगयी थी, जिससे वे दोनों अधिक भोजन करते थे। इसमें अग्निके बलको बढानेवाला अत्युग्र वीर्यवान् केवल एक जिमीकन्द ही है। यह प्रयोग शस्त्र, क्षार और अग्निक्रियाके बिनाही अर्शरोगको दूर करता है । एवं सूजन, श्लीपद, कफ-वातजन्य ग्रहणी, वली-पलितरोग, हिचकी, श्वास, खांसी, राजयक्ष्मा, प्रमेह और अत्युग्र प्लीहा इन सब व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करता है तथा बुद्धिको तीव्र करता है मनुष्योंके लिये वृष्य और उत्तम रसायन है ॥ ५४ ॥ ५७ ॥

काङ्कायनमोदक ।

थप्यापञ्चपलानेकमजाज्या मरिचस्य च ।
पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागराः ॥ ५८ ॥
पलाभिवृद्धाः क्रमशॊ यवक्षारपलद्वयम् ।
भल्लातकपलान्यष्टौ कन्दस्तु द्विगुणो मतः ॥ ५९ ॥
द्विगुणेन गुडेनैषां वटकानक्षसम्मितान् ।
कृत्वैन् भक्षयेत् प्रातस्तक्रमम्भोऽनु वा पिबेत् ॥ ६० ॥
मन्दाग्निं दीपयत्येष ग्रहणीपाण्डुरोगनुत् ।
काङ्कायनेन शिष्येभ्यः शस्त्रक्षाराग्निभिर्विना ॥
भिषग्जितमिति प्रोक्तं श्रेष्ठमर्शोविकारिणाम् ॥ ६१ ॥

हरड २० तोले, जीरा, कालीमिरच और पीपल ये प्रत्येक एक एक पल, एवं पीपलामूल २ पल, चव्य ३ पल, चीतेकी जड ४ पल, सोंठ ५ पल, जवाखार २ पल, शुद्ध भिलावे आठ पल, जिमीकन्द १६ पल और सब औषधियोंसे दुगुना पुराना गुड लेवे। सबको एकत्र कूटपीसकर एक तोलेके बडे बनालेवे । इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक बडा खाय और ऊपरसे मट्ठा अथवा शीतल जल पान करे तो यह बडे मन्दाग्निको दीपन करते हैं । एवं ग्रहणी, पाण्डुरोग आदि विविध रोगोंको नष्ट करते हैं । क्षार और अग्निक्रियाके बिनाही इस कांकायन मोदकके द्वारा अर्शरोगको जीते । यह मोदक कांकायन ऋषिने अपने शिष्योंसे वर्णन किये हैं अर्शरोगियोंके लिये विशेषहितकारी है ॥ ५८-६१ ॥

मणिभद्रमोदक ।

विडङ्गसारामलकाभयानां पलं पलं स्यात्त्रिवृतात्रयं च ।
गुडस्य षड्द्वादशभागयुक्ता मासेन त्रिंशद्गुटिका विधेयाः ॥६२॥