भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 376

३४४ भैषज्यरत्नावली । [अर्शोरोग-

निवारणे यक्षवरेण सृष्टः स माणिभद्रः किल शाक्यभिक्षवे । अयं हि कासक्षयकुष्ठनाशनो भगन्दरप्लीहजलोदरार्शसाम् ॥ यथेष्टचेष्टान्नविहारसेवी ह्यनेन वृद्धस्तरुणो भवेच्च ॥ ६३ ॥

वायविडंगसार, आमले और हरड प्रत्येक चार चार तोले एवं निसोत १२ तोले और पुराना गुड़ २४ तोले सबको विधिपूर्वक मिलाकर ३० गोलियाँ बनालेवे फिर एक मासपर्यन्त प्रतिदिन छः छः माशेकी एक एक गोली सेवन करे। इन मोदकोंको माणिभद्रनामवाले यक्षने शाक्यमुनिके अर्शको निवारण करनेके लिये बनाया था। ये मोदक खाँसी, श्वास, क्षय, कुष्ठ, भगन्दर, जलोदर, बवासीर प्रभृति नानाप्रकारके रोगोंको नष्ट करते हैं। इसका सेवन करते समय यथेच्छ आहार विहार करना चाहिये। इस औषधिको सेवन करनेसे वृद्ध पुरुष भी तरुण होजाता है ॥६२॥६३॥

प्राणदा गुटिका ।

त्रिपलं शृङ्गवेरस्य चतुर्थं मरिचस्य च । पिप्पल्याः कुडवार्द्धं च चव्यं च पलमेव च ॥ ६४ ॥ तालीशपत्रस्य पलं पलार्द्धं केशरस्य च । द्वे पले पिप्पलीूलादर्द्धकर्षं च पत्रकात् ॥ ६५ ॥ सूक्ष्मैला कर्षमेकं च कर्षं च त्वङ्मृणालयोः । गुडात् पलानि त्रिंशच्च चूर्णमेकत्र कारयेत् ॥ ६६ ॥ अक्षप्रमाणा गुटिका प्राणदेति प्रकीर्त्तिता । पूर्वं भक्ष्या च पश्चाच्च भोजनस्य यथाबलम् ॥ मद्यं मांसरस यूषं क्षीरं तोयं पिबेदनु ॥ ६७ ॥

सोंठ १२ तोले, काली मिरच १६ तोले, पीपल ८ तोले, चव्य ४ तोले, तालीस-पत्र ४ तोले, नागकेशर २ तोले, पीपलामूल ८ तोले, तेजपात ८ मासे छोटी इलायची १६ मासे, दालचीनी १६ मासे, खस १६ मासे और पुराना गुड डेढ़सेर सबको एकत्र कूट पीसकर और गुडमें मिलाकर एक एक तोलेकी गोलियाँ बनालेवे, इसको प्राणदा गुटिका कहते हैं। इस बटीको जठराग्निका बलाबल विचारकर भोजनके पहले या पीछे सेवन करे और मदिरा, मांसरस, यूष, दूध और जल इनका अनुपान करे ॥ ६४-६७ ॥