भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३४५


हन्यादर्शांसि सर्वाणि सहजान्यसृजान्यपि ।
वातपित्तकफोत्थानि सन्निपातोद्भवानि च ॥ ६८ ॥
पानात्यये मूत्रकृच्छ्रे वातरोगे गलग्रहे ।
विषमज्वरे च मन्देऽग्नौ पाण्डुरोगे तथैव च ॥ ६९ ॥
कृमिहृद्रोगिणां चैव गुल्मशूलार्त्तिनां तथा ।
श्वासकासपरीतानामेषा स्यादमृतोपमा ॥ ७० ॥
शुण्ठ्याः स्थानेऽभया देया विड्ग्रहे पित्तपायुजे ।
प्राणदायाः सिता देया चूर्णमानाच्चतुर्गुणाः ॥ ७१ ॥

यह गुटिका सहज बवासीर, रक्तकी बवासीर आदि सर्वप्रकारकी बवासीर एवं वात-पित्त-कफसे उत्पन्न हुए रोग तथा सन्निपातजन्य रोग एवं अन्यान्य सब प्रकारके विकारोंमें अमृतकी समान हितकारी है इस बटीको मलविबन्धमें सोंठकी जगह हरड डालकर देवे और पित्तकी बवासीरमें गुडकी जगह सब औषधियोंके चूर्णसे चौगुनी मिश्री डालकर देवे ॥ ६८–७१ ॥

अम्लपित्ताग्निमान्द्यादौ प्रयोज्यं गुदजातुरे ।
अनुपानं प्रयोक्तव्यं व्याधौ श्लेष्मभवे पलम् ॥
पलद्वयं त्वनिलजे पित्तजे तु पलत्रयम् ॥ ७२ ॥
पक्त्वैनं गुडिकाः कार्या गुडेन सितयाऽथवा ।
परं हि वह्निसंसर्गाल्लघुिमानं भजन्ति ताः ७३ ॥

इस प्राणदा गुटिकाको अम्लपित्त मन्दाग्नि और बवासीरमें प्रयोग करे ! इसपर कफके रोगोंमें चार तोले, वातरोगोंमें ८ तोले और पित्तके रोगोंमें १२ तोले अनुपानके द्रव्योंका सेवन करे । यह प्राणदा गुटिका गुडके साथ अथवा मिश्रीके साथ पकाकर भी सिद्ध की जासकती है । इस प्रकार सिद्ध की हुई वे गोलियाँ अग्निके संसर्गसे अत्यन्त हल्की होजाती हैं ॥ ७२ ॥ ७३ ॥

नागार्जुनयोग ।

त्रिफला पञ्चलवणं कुष्ठं कटुकरोहिणी ।
देवदारुविडङ्गानि पिचुमर्दफलानि च ॥ ७४ ॥
बला चातिबला चैव हरिद्रे द्वे सुवर्चला ।
एतत् सम्भृतसम्भारं करञ्जत्वग्रसेन च ॥ ७५ ॥