भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ६ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा- |
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जातमात्रश्चिकित्स्यस्तु नोपेक्ष्योऽल्पतया गदः।
वह्निशस्त्रविषैस्तुल्यः स्वल्पोऽपि विकरोत्यसौ ॥ २६ ॥
यथा स्वल्पेन यत्नेन च्छिद्यते तरुणस्तरुः ।
स एवातिप्रवृद्धस्तु च्छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥ २७ ॥
जबतक प्राण कण्ठमें रहें और इन्द्रियोंकी शक्तिका लोप न हो तबतक चिकित्सा करनी चाहिये । कारण—कालकी गति कुटिल है । रोगके उत्पन्न होते ही चिकित्सा आरम्भ करदेनी चाहिये । रोगको सामान्य समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये । कारण—सामान्यरोग अल्प होनेपर भी अग्नि, शस्त्र और विषकी तरह अत्यन्त प्रबल होजाते हैं । जिस प्रकार तरुणवृक्ष सहजमें ही काटा जासकता है और बड़ा हो जानेपर उसका काटना कठिन हो जाता है ॥ २६-२७ ॥
ग्रहेषु प्रतिकूलेषु नानुकूलं हि भेषजम् ।
ते भेषजानां वीर्याणि हरन्ति बलवन्त्यपि ॥
प्रतिकृत्य ग्रहानादौ पश्चात्कुर्य्याच्चिकित्सितम् ॥ २८ ॥
सूर्यादि ग्रहोंके प्रतिकूल होनेपर किसी भी ओषधिका ठीक २ फल नहीं मालूम होता । कारण ग्रह अतिवीर्य्यवान् ओषधिके भी प्रभावको नष्ट करदेते हैं इसलिये प्रथम ग्रहशान्ति करके फिर चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २८ ॥
याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः ।
सा चिकित्सा विकाराणां कर्म्म तद्भिषजां मतम् ॥ २९ ॥
जिस क्रियाके द्वारा शरीरकी धातुयें समान अवस्थामें रहती हैं, उसको चिकित्सा कहते हैं और वह ही वैद्योंका कर्म्म है ॥ २९ ॥
आसुरी मानुषी दैवी चिकित्सा त्रिविधा मता ।
शस्त्रैः कषायैर्होमाद्यैः क्रमेणान्त्या सुपूजिता ॥ ३० ॥
चिकित्सा तीन प्रकारकी है, जैसे—आसुरी, मानुषी और दैवी । अस्त्रादिद्वारा जो चिकित्सा की जाती है, वह आसुरी चिकित्सा है; ओषधियोंके काथादिके द्वारा जो चिकित्सा की जाती है वह मानुषी और जप, होमादिके द्वारा जो चिकित्सा की जाती है वह दैवी चिकित्सा कहलाती है ॥ ३० ॥