भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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प्रकरणम् १ ] भाषाटीकासहिता । ९


क्वचिद्धर्म्मः क्वचिन्मैत्री क्वचिदर्थः क्वचिद्यशः ।
कर्म्माभ्यासः क्वचिच्चापि चिकित्सा नास्ति निष्फला ॥३१॥

चिकित्साद्वारा कहीं धर्म्म, कहीं मित्रता, कहीं धन, कहीं यशोलाभ और कहीं चिकित्साकर्ममें अभ्यास ही होता है, इसलिये चिकित्सा कहीं भी निष्फल नहीं होती ॥ ३१ ॥


भिषग् द्रव्यमुपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् ।
गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारस्योपशान्तये ॥ ३२ ॥

वैद्य, औषध, परिचारक ( अर्थात् जो आदमी रोगीकी सेवा शुश्रूषा करता है ) और रोगी ये चिकित्साके चारों पाद गुणवान् होनेपर रोग आरोग्य होनेके लिये प्रधान कारण हैं ॥ ३२ ॥


श्रुतेः पर्य्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्म्मता ।
दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥ ३३ ॥

आयुर्वेदशास्त्रमें कहा है कि—शास्त्रदर्शिता, बहुदर्शिता, निपुणता और पवित्रता ये चार गुण वैद्यमें होने आवश्यक हैं ॥ ३३ ॥


प्रशस्तदेशसम्भूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् ।
अल्पमात्रं महावीर्यं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥
उद्भिज्जमपरिक्षुण्णं शुद्धं धात्वादिकं तथा ।
समीक्ष्य काले दत्तं च भेषजं परं मतम् ॥ ३४ ॥

प्रशस्त देश ( अच्छे स्थान ) में उत्पन्न हुई, शुभ दिनमें उखाडी हुई, थोडी मात्रावाली, अत्यन्त वीर्यसम्पन्न एवं गन्ध, वर्ण और रसविशिष्ट तथा कीडे आदिके द्वारा खराब न की हुई, वृक्ष-लतादिसे उत्पन्न हुई, शोधित धातु आ.दि जो यथासमयमें प्रयोग की गयी हों, उनको उत्कृष्ट ओषधि कहते हैं ॥ ३४ ॥


उपचारज्ञता दाक्ष्यमनुरागं च भर्त्तरि ।
शौचं चेति चतुर्थोऽयं गुणः परिचरे जने ॥ ३५ ॥

जो मनुष्य रोगीकी सेवा-शुश्रूषा अच्छे प्रकार करनी जानता हो सब कामोंमें निपुण स्वामीभक्त और शुद्धाचारी हो, ऐसा मनुष्य परिचारक होना चाहिए ॥३५॥

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