भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

८ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा-


स्मृतिनिर्देशकारित्वमभीरुत्वमथापि च ।
ज्ञापकत्वं च रोगाणामातुरस्य गुणा मताः ॥ ३६ ॥

जो रोगी वैद्यके सामने रोगका पूर्ववृत्तान्त स्मरण करके अच्छे प्रकार कह सकता है और डरता नहीं है तथा रोगकी वर्त्तमान अवस्थाको भी विशेष रूपसे कह सकता है ऐसा रोगीही चिकित्साका उपयुक्त पात्र है । ये रोगीके लक्षण हैं ॥ ३६ ॥

मृद्दण्डचक्रसूत्राद्याः कुम्भकाराहते यथा ।
नावहन्ति गुणं वैद्याहते पादत्रयं तथा ॥ ३७ ॥

जिस प्रकार कुम्हारके विना मृत्तिका, दण्ड, चक्र और सूत्रादि उपकरणोंके होनेपरभी घट आदि कोई पात्र नहीं बन सकता, उसी प्रकार औषध, परिचारक और रोगी इन तीनों पदोंके होनेपर भी एक सुचिकित्सकके विना रोग शमन नहीं होसकता । अत एव उक्त चारों पादोंमें वैद्यही मुख्य है ॥ ३७ ॥

यस्तु रोगमविज्ञाय कर्म्माण्यरभते भिषक् ।
अप्यौषधविधानज्ञस्तस्य सिद्धिर्यदृच्छया ॥ ३८ ॥
यस्तु रोगविशेषज्ञः सर्वभैषज्यकोविदः ।
साध्यासाध्यविधानज्ञस्तस्य सिद्धिः करे स्थिता ॥ ३९ ॥
दृष्टकर्म्मा च शास्त्रज्ञो वैद्यः स्यात्सिद्धिभागसौ ।
एकाङ्गहीनो न श्लाघ्य एकपक्ष इव द्विजः ॥ ४० ॥

जो वैद्य, रोगको अच्छे प्रकार न जानकर चिकित्सा आरंभ करदेता है वह औषधि विधानको अच्छे प्रकारसे जानता भी है तो भी उसको चिकित्सा कार्यमें सिद्धि प्राप्त होना अनिश्चित या दैवाधीन है । और जो वैद्य सर्व प्रकारके रोगोंके तत्त्वको जानता है, सब प्रकारकी ओषधियोंको जानता है, एवं ओषधिप्रयोगमें चतुर और रोगके साध्यासाध्य लक्षणोंको जानता है, उसके आगे सिद्धि सदैव हाथ जोडे खडी रहती है । दृष्टकर्मा और आयुर्वेद शास्त्रका ज्ञाता वैद्यही चिकित्साकार्यमें सिद्धि प्राप्त करनेका भागी हो सकता है । जिसमें उपर्युक्त गुण होते हैं वह ही वैद्य श्रेष्ठ होता है । इन गुणोंमेंसे एक गुणके न होनेपरभी वैद्यको एक पंखवाले पक्षीकी समान अकर्मण्य कहा है ॥ ३८-४० ॥

शास्त्रं गुरुमुखोद्गीर्णमादायोपास्य चासकृत् ।
यः कर्म्म कुरुते वैद्यः स वैद्योऽन्ये तु तस्कराः ॥ ४१ ॥