भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३५१
“तोयपूर्णे यदा पात्रे क्षिप्तो न प्लवते गुडः ।
क्षिप्तश्च निश्चलस्तिष्ठेत् पतितस्तु न शीर्यते ॥ ९ ॥
यदा दर्वीप्रलेपः स्याद्यावद्वा तन्तुली भवेत् ।
एष पाको गुडादीनां सर्वेषां परिकीर्त्तितः ॥ १० ॥
सुखमर्दः खरस्पर्शो गन्धवर्णसमन्वितः ।
पीडितो भजते मुद्रां गुडः पाकमुपागतः” ॥ ११ ॥
यह गुड पाँचों प्रकारके गुल्म, प्रमेह, पाण्डुरोग, हलीमक, सर्वप्रकारके अतिसार, सम्पूर्ण उदररोग, संग्रहणी, मन्दाग्नि, राजयक्ष्मा, पीनस, प्रतिश्याय, आढ्यवात और अन्यान्य सर्वप्रकारके विकारोंमें हित करनेवाला है और यह बवासीरको तत्काल नष्ट करता है । यह हजारोंबार परीक्षा करके देखा है । इसको सेवन करनेवाले मनुष्य आरोग्य होकर सौ वर्षतक जीते हैं । यह आयुको बढानेवाला, वलीपलितरोगनाशक, श्रेष्ठ रसायन और उत्तम मेधाजनक औषध है । यह श्रीबाहुशालगुड बवासीरका शत्रु कहा गया है । “जब जलसे भरेहुए पात्रमें गुड डालनेपर तैरता न रहे अथवा जलमें नीचे न बैठे और फैले भी नहीं वा करछीसे चिपकने लगे किंवा अँगुलीपर लेकर बटनेसे तारसे छूटने लगे और जिस समय गुडको सहज २ मर्दन अथवा स्पर्श करे एवं अँगुलीसे मसले उस समय यदि गुडक ऊपर अंगुलीके निशान पडजायँ और गुडमें उपयुक्त गन्ध, वर्ण एवं रस हो तब गुडपाक हुआ जानना चाहिये । यह समस्त गुडपाकोंकी विधि कहीगई है” ॥ १०४-१११॥
गुडभल्लातक ।
भल्लातकसहस्र द्वे जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पादशेषे रसे तस्मिन् पचेद् गुडतुलां भिषक् ॥ १२ ॥
भल्लातकसहस्रार्द्धं छित्त्वा तत्र प्रदापयेत् ।
सिद्धेऽस्मिंस्त्रिफलाव्योषयमानीमुस्तसैन्धवम् ॥ १३ ॥
कर्षांशसम्मितं दद्यात् त्वगेलापत्रकेशरम् ।
खादेदग्निबलापेक्षी प्रातरुत्थाय मानवः ॥ १४ ॥
कुष्ठार्शःकामलामेहग्रहणीगुल्मपाण्डुताः ।
हन्यात् प्लीहोदरं कासकृमिरोगभगन्दरान् ।
गुडभल्लातको ह्येष श्रेष्ठश्चार्शोविकारिणाम् ॥ १५ ॥