भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५२ | भैषज्यरत्नावली । | [ अर्शोरोग-
शुद्ध किये हुए २००० भिलावोंको लेकर १ द्रोण जलमें पकावे जब पकते २ चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उतार कर छानलेवे फिर उस रसमें गुड १०० पल और टुकड़े किये हुए ५०० भिलावे डालकर पकावे । जब पाक अच्छे प्रकारसे सिद्ध होजाय तब त्रिफला, त्रिकुटा अजवायन, नागरमोथा, सैंधानमक, दालचीनी छोटी इलायची, तेजपात और नागकेसर ये प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष प्रमाण बारीक पीसकर मिलादेवे । इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल अपनी अग्निके बलानुसार सेवन करे । इससे कुष्ठ, अर्श, कामला, प्रमेह ग्रहणी, गुल्म, पाण्डुता, खाँसी, कृमिरोग, भगन्दर, प्लीहा, और उदरविकार ये सब रोग नष्ट होते हैं । यह गुडभल्लातक बवासीरके रोगियोंकी एकमात्र उत्तम औषधि है ॥ १२-१५ ॥
अन्य-गुडभल्लातक ।
दशमूलाऽमृता भार्ङ्गी श्वदंष्ट्रा चित्रकं शठी ।
भल्लातकसहस्रं च पलांशं क्वाथयेद् बुधः ॥ १६ ॥
पादशेषे जलद्रोणे रसे तस्मिन् विपाचयेत् ।
दत्त्वा गुडतुलामेकां लेहीभूतं समुद्धरेत् ॥ १७ ॥
माक्षिकं पिप्पलीं तैलमौरुबूकं च दापयेत् ।
कुडवं कुडवं चात्र त्वगेला मरिचस्तथा ॥ १८ ॥
अर्शः कासमुदावर्त्तं पाण्डुत्वं शोथमेव च ।
नाशयेद्वह्निसारं च गुडभल्लातकः स्मृतः ॥ १९ ॥
दशमूल, गिलोय, भारंगी, गोखुरू, चीतेकी जड और कचूर प्रत्येक चार चार तोले एवं शुद्ध भिलावे एक हजार ले सबको एकत्र मिलाकर एक द्रोण जलमें पकावे जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे फिर इस क्वाथमें अण्डका तेल एक कुडव और पुराना गुड सौ पल डालकर फिर पाक करें । जब पककर लेहकी समान होजाय तब नीचे उतारकर उसमें पीपल, दालचीनी, छोटी इलायची आरै काली मिरच ये चारों एक कुडव और शीतल होनेपर शहद एक कुडव परिणाम मिलादेवे । यह गुडभल्लातक अर्शरोग, खाँसी,उदावर्त्त,पाण्डु,शोथ और मन्दाग्नि इन सब विकारोंको नष्ट करता है ॥ १६-१९ ॥
माणशूरणादि-लोह ।
माणशूरणभल्लातत्रिवृद्दन्तीसमन्वितम् ।
त्रिकत्रयसमायुक्तमयो दुर्नामनाशनम् ॥ १२० ॥