भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 388
३५६भैषज्यरत्नावली ।[ अर्शोरोग-

वटीको चार रत्ती प्रमाण लेकर शहद और घीमें अच्छे प्रकारसे खरल करके सेवन करे फिर यथाक्रमसे बढाते २ चार माशेतक इसकी मात्राको बढावे। औषध सेवनके पश्चात यदि निसोत, दन्ती, दारचीनी, तेजपात और इलायची इनके एक एक कर्षप्रमाण चूर्णको भक्षण करे तो यह सम्पूर्ण शुक्रगत दोष और दारुण प्रमेहोंको तत्काल दूर करती है। वली ( शरीरमें वलिका पडना ) और पलित ( असमय बालोंका पकना ) इन विकारोंसे रहित होकर वृद्धपुरुष भी तरुण होजाता है। “ वृद्धवैद्योंके उपदेशसे कोई २ वैद्य इसमें दो तोले शुद्ध पारा और दो तोले शुद्ध गन्धक अथवा केवल मूर्च्छित पारेको ही ४ तोले किंवा कोई कोई चार तोले अभ्रक कोही डालते हैं ” ॥ ३६-१४० ॥

रसगुडिका ।

रसस्तु पादिकस्तुल्या विडङ्गमरिचाभ्रकाः ।
गङ्गापालङ्कजरसे खल्लयित्वा पुनः पुनः ॥ ४१ ॥
रक्तिमात्रा गुदार्शोघ्नी वह्नेरत्यर्थदीपनी ॥ ४२ ॥

रससिन्दूर १ भाग एव वायविडंग, कालीमिरच और अभ्रक ये प्रत्येक एक एक भाग लेवे। सबको एकत्र मिलाकर शालिञ्चशाक बड़ी पालकके रसमें खरलकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। यह वटी अर्शरोगको नष्ट करती है और अग्निको अत्यन्त दीपन करती है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥

तीक्ष्णमुखरस ।

मृतसूतार्कहेमाभ्रं तीक्ष्णं मुण्डं च गन्धकम् ।
मण्डूरं च समं ताप्यं मर्द्यं कन्याद्रवैर्दिनम् ॥ ४३ ॥
अन्धमूषागतं सर्वं ततः पाच्यं दृढाग्निना ।
चूर्णितं सितया माषं खादेत्तच्चार्शसां हितम् ।
रसस्तीक्ष्णमुखो नाम चासाध्यमपि साधयेत् ॥ ४४ ॥

रससिन्दूर, ताम्रभस्म, सुवर्णभस्म, अभ्रकभस्म, तीक्ष्ण लोहभस्म, लोहभस्म, शुद्ध गन्धक, मण्डूरभस्म और सोनामाखीकी भस्म इन सबको समान भाग लेकर एक एक दिनतक घीगुवारके रसमें खरल करे फिर उसको अन्धमूषायन्त्रमें रखकर तीक्ष्ण अग्निके द्वारा पकावे । जब पककर स्वयं शीतल होजाय तब उसमेंसे औषधिको निकालकर बारीक चूर्ण करलेवे। इसमेंसे एक एक माशे परिमाण लेकर मिश्रीके साथ सेवन करे तो यह तीक्ष्णमुख नामक रस