भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासाहता : ३६७
असाध्य अर्शरोगको भी दूर करदेता है । अर्शरोगियोंके लिये यह अत्यन्त हितकारी है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥
अर्शकुठाररस ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्ध मृतलौहं च ताम्रकम् ।
प्रत्येकं द्विपलं दन्ती व्यूषणं शूरणं तथा ॥ ४५ ॥
शुभाटङ्कयवक्षारसैन्धवं पलपञ्चकम् ।
पलाष्टकं स्नुहीक्षीरं द्वात्रिंशच्च गवां जलैः ॥ ४६ ॥
आपिण्डितं पचेदग्नौ खादेन्माषद्वयं ततः ।
रसश्चार्शःकुठारोऽयं सर्वरोगकुलान्तकः ॥ ४७ ॥
शुद्ध पारा ४ तोले एवं शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, ताम्र भस्म दन्तीकी जड, साँठ, पीपल, मिरच और जिमीकन्द ये प्रत्येक ८-८ तोले, वंशलोचन, सुहागा, जवाखार और सेंधानमक प्रत्येक २०-२०तोले थूहरका दूध ३२ तोले और गोमूत्र १२८ तोलें लेवे । इन सबको एकत्र कूट पीसकर गोमूत्रमें मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पकजाय तब औषधिको सुखाकर चूर्ण करलेवे । फिर इस अर्शकुठारनामक रसको प्रतिदिन दो दो माशेकी मात्रासे सेवन करे तो इससे सर्वप्रकारके रोग नष्ट होते हैं ॥ ४५–४७ ॥
चक्राख्यरस ।
मृतसूताभ्रवैक्रान्तं ताम्रं कांस्यं समं समम् ।
सर्वतुल्येन गन्धेन दिनं भल्लातकद्रवैः ॥ ४८ ॥
मर्दयेद् यत्नतः पश्चाद् वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जिकाम् ।
भक्षणाद् गुदजान् हन्ति द्वन्द्वजान् सर्वजानपि ॥ ४९ ॥
रससिन्दूर, अभ्रक, वैक्रान्तमणि, ताँबा, और कांसा पत्येककी भस्म समान भाग और सबकी समान भाग शुद्ध गन्धक लेवे । सबको एकत्र मिलाकर भिलावेके रसमें एक दिनतक उत्तम प्रकारसे खरलकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंके खानेसे द्विदोषज अथवा त्रिदोषज सभी प्रकारके अर्शरोग नष्ट होते हैं ॥ ४८ ॥ ४९ ॥
चञ्चुत्कुठाररसँ ।
रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं भागयुग्मकम् ।
दन्तीतत्रिकटुकुष्ठैकं षड्भागं लाङ्गलस्य च ॥ १५० ॥