भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३६८भैषज्यरत्नावली ।[ अर्शोरोग-

क्षारसैन्धवटङ्कानां प्रत्येकं भागपञ्चकम् ।
गोमूत्रस्य च द्वात्रिंशत् स्नुहीक्षीरं तथैव च ॥ ५१ ॥
यावच्च पिण्डितं सर्वं तावन्मृद्वग्निना पचेत् ।
माषद्वयं ततः खादेद् दिवास्वप्नादि वर्ज्जयेत् ॥
रसश्चञ्चूत्कुठारोऽयमर्शांसां कुलनाशनः ॥ ५२ ॥

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक और लोहा ये प्रत्येक दो दो भाग, दन्ती, सोंठ, पीपल मिरच और कूट ये प्रत्येक एक एक भाग, कलिहारीकी जड ६ भाग, जवाखार, सैंधानमक और सुहागा प्रत्येक ५-५ भाग, गोमूत्र और थूहरका दूध प्रत्येक बत्तीस बत्तीस भाग लेवे । सबको एकत्र मिलाकर तबतक मन्द २ अग्निसे पकावे जबतक पकते पकते सब औषधि पिण्डकी समान होजाय । फिर उसका चूर्ण करके उसमेंसे दो दो माशे परिमाण सेवन करे । इसपर दिनमें सोना आदि त्याग देना चाहिये । यह चञ्चूत्कुठाररस सम्पूर्ण उपद्रवोंसहित अर्शोरोगको नष्ट करता है ॥ ५०-५२ ॥

चक्रेश्वररस ।

चतुर्भागं शुद्धसूतं पञ्च टङ्कणमभ्रकम् ।
त्रिदिनं भावयेद् घर्में द्रवैः श्वेतपुनर्नवैः ॥ ५३ ॥
द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं वातदुर्नामशान्तये ।
सिद्धश्चक्रेश्वरो नाम रसश्चार्शःकुलान्तकः ॥ ५४ ॥

शुद्ध पारा ४ भाग एवं सुहागा और अभ्रक प्रत्येक ५-५ भाग लेवे । सबको सफेद पुनर्नवैके रसमें धूपमें रखकर तीन दिनतक भावना देवे । पश्चात् दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनाकर नित्य एक एक गोली सेवन करे । वातज बवासीरको नष्ट करनेके लिये तो यह चक्रेश्वर नामक रस प्रसिद्ध ही है । एवं अन्यान्य अर्शोंको भी समूल नष्ट करता है ॥ ५३ ॥ ५४ ॥

शिलागन्धकवटी ।

शिलागन्धकयोश्चूर्णे पृथग् भृङ्गरसाप्लुतम् ।
सप्ताहं भावयेत् सर्पिर्मधुभ्यां च विमर्दयेत् ॥ ५५ ॥
अर्शंसश्चानुलोम्यार्थं हुताग्निवलवर्द्धनम् ।
रक्तिकाद्वितयं खादेत् कुष्ठादिरहितो नरः ॥ ५६ ॥