भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६१
व्योषाद्यघृत ।
व्योषगर्भे पलाशस्य त्रिगुणे भस्मवारिणि ।
साधितं पिबतः सर्पिः पतन्त्यर्शांस्यसंशयम् ॥ ६६ ॥
सोंठ, पीपल और मिरच इनके समान भाग मिश्रित कल्कसे तिगुने ढाककी भस्मके जलमें घृतको सिद्ध करके पान करनेसे अर्शके अंकुर निश्चय गिरजाते हैं ॥
चव्याद्यघृत ।
चव्यं त्रिकटुकं पाठां क्षारं कुस्तुम्बुरूणि च ।
यमानी पिप्पलीमूलमृते च विडसैन्धवे ॥ ६७ ॥
चित्रकं बिल्वमभयां पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत् ।
शकृद्वातानुलोम्यार्थं जाते दध्नि चतुर्गुणे ॥ ६८ ॥
प्रवाहिकां गुदभ्रंशं मूत्रकृच्छ्रं परिस्रवम् ।
गुदवङ्क्षणशूलं च घृतमेतद् व्यपोहति ॥ ६९ ॥
चव्य, सोंठ, पीपल, मिरच, पाठ, जवाखार, धनियां, अजवायन, पीपलामूल, नागरमोथा, बिरियासंचर नमक, सेंधानमक, चीतेकी जड, बेलगिरी और हरड इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसलेवे फिर इनके कल्क और कल्कसे चौगुने दहीके पानीमें १ प्रस्थ घृतको पकावे इस घृतको पान करनेसे मल और वायुका अनुलोमन होता है । एवं यह घृत प्रवाहिका, गुदभ्रंश, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, रक्तस्राव, गुदा और वंक्षणका शूल इन सबको दूर करता है ॥ ६७-६९ ॥
कुटजाद्यघृत ।
कुटजफलवल्कलकेशरनीलोत्पललोध्रधातकीकल्कैः ।
सिद्धं घृत विधेयं शूलं रक्तार्शसां भिषजा ॥ १७० ॥
इन्द्रजौ, कुडेकी जडकी छाल, नागकेशर, नीलकमल, लोध आर धायके फूल इनके समान भाग मिश्रित कल्कैक द्वारा घृतको यथाविधि सिद्ध करके शूल और रुधिरकी बवासीरवाले रोगियोंको सेवन कराना चाहिये ॥ १७० ॥
। सह्यमृतघृत ।
पचेद्वारिचतुर्द्रोणे कण्टकार्यामृताशतम् ।
तत्राभित्रिफलाव्योषपूतीकत्वक्कलिङ्गकैः ॥ ७१ ॥
सकाश्मर्यविडङ्गांस्तु सिद्धं दुर्नाममेहजित् ।
घृत सिंहामृतं नाम बोधिसत्त्वेन भाषितम् ॥ ७२ ॥