भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३६२भैषज्यरत्नावली ।[ अर्शोरोग

कटेरी और गिलोय इन दोनोंको सौ सौ पल लेकर ४ द्रोण परिमाण जलमें पकावे जब चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें चीतेकीं जड, हरड, आमला, बहेडा, सोंठ, पीपल, मिरच, दुर्गन्ध करंजकी छाल, इन्द्रजौ, कुम्भेरु और वायविडंग इनके समान भाग मिश्रित कल्क और १ प्रस्थ घृतकों डालकर विधिपूर्वक घृतको सिद्ध करे । यह सिंह्यामृतनामक घृत बवासीर और प्रमे-हको नष्ट करता है ऐसा बोधिसत्त्वमुनिने कहा है ॥ ७१ ॥ ७२ ॥

सुनिषण्णक चांगेरीघृत ।

अवाक्पुष्पी बला दार्बी पृश्निपर्णी त्रिकण्टकः ।
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गाश्च द्विपलोन्मिताः ॥ ७३ ॥
कषाय एषां पेष्यास्तु जीवन्ती कटुरोहिणी ।
पिप्पली पिप्पलीमूलं मरिचं देवदारु च ॥ ७४ ॥
कलिङ्गं शाल्मलीपुष्पं वीरा चन्दनमञ्जनम् ।
कट्फलं चित्रको मुस्तं प्रियङ्ग्वतिविषे स्थिरा ॥ ७५ ॥
पद्मोत्पलानां किञ्जल्कः समङ्गा सनिदिग्धिका ।
बिल्वं मोचरसः पाठा भागाः स्युः कार्षिकाः पृथक् ॥ ७६ ॥
चतुःप्रस्थशृतं प्रस्थं कषायमवतारयेत् ।
"त्रिंशत्पलानि तु प्रस्थो विज्ञेयो द्विपलाधिकः" ॥ ७७ ॥
सुनिषण्णकचाङ्गेर्योः प्रस्थौ द्वौ स्वरसस्य च ।
सर्वैरेतैैर्यथोद्दिष्टैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ७८ ॥

सोया, खिरैंटी, दारुहल्दी, पृश्निपर्णी, गोखरू, वड, गूलर और पीपलके अंकुर ये प्रत्येक आठ आठ तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे जब चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें जीवन्ती, कुटकी, पीपल पीपला-मूल, मिरच, देवदारू, इन्द्रजौ, सेमलके फूल, क्षीरकाकोली, लालचन्दन, रसौंत, कांयफल, चीता, नागरमोथा, फूलप्रियंगु, अतीस, शालपर्णी, कमलकेशर, नीले कमलकी केशर, लज्जावन्ती, कटेरी, मोचरस और पाठ इन प्रत्येक औषधिको एक-एक कर्ष प्रमाण लेकर बारीक पीसकर औषधियोंके ४ प्रस्थ क्वाथमें डालकर जब पकते २ एक-प्रस्थ क्वाथ शेष रहजाय तब उतारलेवे । ( यहाँपर प्रस्थ ३२ पलका मानना चाहिये ) । फिर उसमें शिरियारीके शाकका स्वरस और नोनियाका स्वरस एक एक प्रस्थ एवं घृत एक प्रस्थ डालकर विधिपूर्वक घृतको पकावे ॥ ७३-७८ ॥