भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६५
ग्रहणीपाण्डुरोगघ्नं वातवर्चोऽनुलोमनम् ।
दीपनं चारुचिघ्नं च दन्त्यरिष्टमिदं विदुः ॥
पात्रेऽरिष्टादिसन्धान धातकीलोध्रलेपिते ॥ ९२ ॥
दन्तीकी जड, चीतेकी जड और दशमूलकी समस्त औषधियाँ प्रत्येकको चार चार तोले लेकर एकत्र कूटकर १ द्रोण जलमें पकावे और पाक होते समय उसमें हरड आमला और बहेडा इन तीनोंके पत्तोंको तीन पल प्रमाण डाल देवे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर कपडेमें छानलेवे । फिर शीतल होनेपर उसमें पुराना गुड सौ पल प्रमाण डालकर घीके चिकने बर्तनमें भरकर और उसके मुँहको अच्छे प्रकारसे बन्द करके पन्द्रह दिनतक रक्खा रहनेदेवेँ तत्पश्चात् इसको उचित मात्रासे प्रतिदिन पान करनेसे मनुष्य अर्शारोगसे सर्वथा मुक्त होजाता है । यह अरिष्ट ग्रहणी और पाण्डुरोगनाशक, वायु और मलका अनुलोमन करनेवाला, अग्निदीपक और अरुचिको दूर करनेवाला है । इसको पूर्वाचार्यगण दन्त्यरिष्ट कहते हैं । धायके फूल और लोधके द्वारा लेप कियेहुए पात्रमें अरिष्टादि रखने चाहिये ॥ १८९-१९२ ॥
क्षार ।
प्रशस्तेऽहनि नक्षत्रे कृतमङ्गलपूर्वकम् ।
कालमुष्ककमाहृत्य दग्ध्वा भस्म समाहरेत् ॥ ९३ ॥
आढकं त्वेकमादाय जलद्रोणे पचेद्भिषक् ।
चतुर्भागावशिष्टेन वस्त्रपूतेन वारिणा ॥ ९४ ॥
शंखचूर्णस्य कुडवं प्रक्षिप्य विपचेत पुनः ।
शनैः शनैर्मृदावग्नौ यावत् सान्द्रतनुर्भवेत् ॥ ९५ ॥
सर्ज्जिकायावशूकाभ्यां शुण्ठी मरिचपिप्पली ।
वचा चातिविषा चैव हिङ्गुचित्रकयोस्तथा ॥ ९६ ॥
एषां चूर्णानि निक्षिप्य पृथक्त्वेनाष्टमाषकम् ।
दर्ग्या संघट्टितं चापि स्थापयेदायसे घटे ॥
एष वह्निसमः क्षारः कीर्त्तितः कश्यपादिभिः ॥ ९७ ॥
उत्तम दिन और शुभ नक्षत्रमें पहले मांगलिक कार्य करके काले फलके घण्टा-पाटलवृक्षकी शाखा लाकर उसको अग्निमें जलाकर भस्म करलेवे फिर उस भस्मको १ आढक परिमाण लेकर १ द्रोण जलमें पकावे जब पकते २ चौथाई भाग जल