भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६६ भेषज्यरत्नावली । [अर्शोरोग-
शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उसमें शंखका चूर्ण १ कुडव परि- माण डालकर धीरे २ मन्द अग्निने पकावे जब पकते २ पाक गाढा होजाय तब उसको नीचे उतारकर उसमें सज्जी, जवाखार, सोंठ मिरच, पीपल, वच, अतीस, हींग और लालचीतेकी जड इन औषधियाके आठ आठ मासे चूर्णको डालकर करछीसे अच्छीतरह घोटकर लोहंके पात्रमें भरकर रखदेवे । यह क्षार अग्निकी समान तीक्ष्ण है ऐसा कश्यपादि ऋषियोंने कहा है ॥ ९३-९७॥
क्षारपाकविधिः
तोये कालकमुष्ककस्य विपचेद्भस्माढकं षड्गुणे पात्रे लौहमये दृढे विपुलधीर्द्वर्व्या शनैर्घट्टयन् । दग्ध्वाऽग्नौ बहुशंखनाभिशकलान् पूतावशेषे क्षिपे- द्यद्येरण्डजनालमेष दहति क्षारो वरो वाक्शतात् ॥९८॥ प्रायस्त्रिभागशिष्टेऽस्मिंस्वच्छपैच्छिल्यरक्तता । सञ्जायते तदास्राव्य क्षारको ग्राह्यमिष्यते ॥ ९९ ॥ तुर्येणाष्टमकेन षोडशगुणेनांशेन संव्यूहिमो मध्यः श्रेष्ठ इति क्रमेण विहितः क्षारोदकाच्छङ्कः॥२०० नातिसान्द्रो नातितनुः क्षारपाक उदाहृतः । दुर्नामकादौ निर्दिष्टः क्षारोऽय प्रतिसारणः ॥ १ ॥ पानीयो यस्तु गुल्मादौ तं वारानेकविंशतिम् । स्रावयेत् षड्गुणे तोये केचिदाहुश्चतुर्गुणे ॥ २ ॥
काले फूलके घण्टापाढलवृक्षकी भस्मको १ आढक परिमाण लेकर छःगुने जलमें डालकर लोहेके पात्रमें मन्द २ अग्निसे पकावे और करछीसे धीरे धीरे चलाता जाय और उसमें शंखनाभिके टुकडोंको अग्निमें दग्ध करके, और वस्त्रमें छानकर डालदेवे सौकी गिनती गिननेमें जितनी देर लगे उतनी देरमें यह क्षार यदि अण्डकी नालको जलादेवे तो उत्तम क्षार हुआ जानना चाहिये । प्रायः तीसरा भाग जल अवशेष रहनेपर इस क्षारमें पिच्छिलता और लालिमा उत्पन्न होजाय तो उसको टपकाकर क्षार जल ग्रहण करना चाहिये । मृदु, मध्य और तीक्ष्ण इन भेदोंसे क्षार तीन प्रकारका होता है । पूर्वोक्त क्षार जलसे चौथाई भाग शंखभस्म डालकर बनायाहुआ क्षार मृदु क्षार, जलसे आठवाँ भाग शंखभस्म डालकर बनायाहुआ क्षार मध्यम और