भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३६९


हरीतकी भक्ष्यमाणा नागरेण गुडेन वा ।
सैन्धवोपहिता वापि सातत्येनाग्निदीपनी ॥ ४ ॥
हरड और सोंठके चूर्णको गुड वा सैन्धानमकके साथ प्रतिदिन सेवन करनेसे अग्नि दीपन होती है ॥ ४ ॥

समयावशूकमहौषधचूर्णं लीढं घृतेन गोसर्गे ।
कुरुते क्षुधां सुखोदकं पीतं विश्वौषधं वैकम् ॥ ५ ॥
जवाखार और सोंठके चूर्णको समान भाग लेकर अथवा केवल सोंठके चूर्णको गौके घीमें मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल चाटे और ऊपरसे कुछ गरम जल पीवे तो क्षुधाकी वृद्धि होती है ॥ ५ ॥

अन्नमण्डं पिबेदुष्णं हिङ्गुसौवर्चलान्वितम् ।
विषमोऽपि समस्तेन मन्दो दीप्येत पावकः ॥ ६ ॥
हींग और काला नमक मिलाकर भातका सुहाता २ मांड पीनेसे विषमाग्नि सम और मन्दाग्नि दीपन होती है ॥ ६ ॥

भोजनाग्रे सदा पथ्यं जिह्वाकण्ठावशोधनम् ।
अग्निसन्दीपनं हृद्यं लवणाईकभक्षणम् ॥ ७ ॥
भोजन करनेसे पहले प्रतिदिन सैंधानमक और अदरखको भक्षण करनेसे जीभ और कण्ठकी शुद्धि होती है। अग्नि दीपन होती है और यह प्रयोग हृदयको हितकारी है ॥ ७ ॥

तीक्ष्णाग्निचिकित्सा ।

नारीक्षीरेण संयुक्तां पिबेत्तौदुम्बरीं त्वचम् ।
आभ्यां वा पायसं सिद्धं पिबेदत्यग्निशान्तये ॥ १ ॥
यत् किञ्चिद् गुरु मेध्यं च श्लेष्मकारि च भेषजम् ।
सर्वं तदत्यग्निहितं भुक्त्वा प्रस्वपनं दिवा ॥ २ ॥
तीक्ष्णाग्निको शान्त करनेके लिये गूलरकी छालको स्त्रीके दूधमें पीसकर पान करे अथवा स्त्रीके दूध और गूलरकी छालकी खीर बनाकर सेवन करे। एवं गुरुपाकी मेध्य और कफकारक जितने पदार्थ या औषध हैं, उन सबको सेवन करना और दिनमें सोना ये सब तीक्ष्णाग्निवाले रोगीके लिये हितकर है ॥ १ ॥ २ ॥

मुहुर्मुहुरजीर्णेऽपि भोज्यमस्योपकल्पयेत् ।
निरिन्धनोऽन्तरं लब्ध्वा यथैनं न निपातयेत् ॥ ३ ॥

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