भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३७०भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य--

तीक्ष्ण अग्निवाले मनुष्यको अजीर्ण होनेपर भी बारबार भोजन कराना चाहिये । कारण जिससे भोजनरूपी ईंधनके बिना जठराग्नि अवसर पाकर शरीरके रसादिको सुखाकर रोगीको नष्ट न करदेवे ॥ ३ ॥

आमाजीर्णचिकित्सा ।

तत्रामे वमनं कार्यं विदग्धे लंघन हितम् ॥ १ ॥
आमके अजीर्णमें वमन और विदग्धाजीर्णमें लंघन कराने उपयोगी हैं ॥ १ ॥

वचालवणतोयेन वान्तिरामे प्रशस्यते ।
कणासिन्धुवचाकल्कं पीत्वा च शिशिराम्भसा ॥ २ ॥
आमयुक्त अजीर्णमें वच और सैंधेनमकके चूर्णको गरम जल डालकर पान करानेसे अथवा पीपल सैंधानमक और वच इनके कल्कको शीतल जलके साथ पान करानेसे वमन होकर आम शान्त होती है ॥ २ ॥

धान्यनागरसिद्धं तु तोयं दद्याद्विचक्षणः ।
आमाजीर्णप्रशमनं दीपनं वस्तिशोधनम् ॥ ३ ॥
धनियाँ और सोंठका क्वाथ सेवन करनेसे अमाजीर्ण शमन होता है, अग्निदीपन होती है और मूत्राशय शुद्ध होता है ॥ ३ ॥

भवेद्यदा प्रातरजीर्णशङ्का तदाऽभयां नागरसैन्धवाभ्याम् ।
विचूर्णितां शीतजलेन भुक्त्वा भुञ्ज्यादशङ्कं मितमन्नकाले ॥
यदि प्रातःसमय अजीर्णकी आशंका हो तो हरड, सोंठ और सैंधानमक इनको एकत्र पीसकर शीतल जलके साथ पान करके भोजनके समय थोडा भोजन कराना चाहिये ॥ ४ ॥

चित्रकगुडिका ।

चित्रकं पिप्पलीमूलं द्वौ क्षारौ लवणानि च ।
व्योषं हिङ्ग्वजमोदां च चव्यं चैकत्र चूर्णयेत् ॥ ५ ॥
सौवर्चलं सैन्धवं च विडमौद्भिदमेव च ।
सामुद्रेण समं पञ्चलवणान्यत्र योजयेत् ॥ ६ ॥
गुडिका मातुलुङ्गस्य दाडिमस्य रसेन वा ।
कृत्वा विपाचयत्यामं दीपयत्याशु चानलम् ॥ ७ ॥
[ दृष्टफलोऽयम् ]