भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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३७२भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

व्यायामप्रमदाध्ववाहनरतान् क्लान्तानतीसारिणः शूलश्वासवतस्तृषापरिगतान् हिक्कामरुत्पीडितान् । क्षीणान् क्षीणकफाञ्छिशून्मदहतान् वृद्धान् रसाजीर्णिनो रात्रौ जागरितान्नरान् निरशनान् कामं दिवा स्वापयेत् ॥ २ ॥

रसशेषाजीर्णमें व्यायाम, दण्ड कसरत आदि परिश्रम, स्त्रीप्रसङ्ग, मार्ग चलने और घोड़े आदिकी सवारीपर चढ़नेसे थकेहुए मनुष्योंको एवं अतीसार, शूल, श्वास, तृषा, हिचकी और वायुसे पीड़ित रोगियोंको तथा क्षीणकफवाले, बालक, मद्यपीनेसे बेहोश, वृद्ध, अजीर्णरसवाले, रात्रिम जागनेवाले और लंघन करनेवाले ऐसे मनुष्योंको दिनमें यथेच्छ शयन करानाही श्रेष्ठ है ॥ २ ॥

आलिप्य जठरं प्राज्ञो हिङ्गुत्र्यूषणसैन्धवैः । दिवास्वप्नं प्रकुर्वीत सर्वाजीर्णप्रणाशनम् ॥ ३ ॥

हींग, सोंठ, पीपल, मिरच और सेंधानमक इनको पीसकर पेटपर लेप करके दिनमें शयन करानेसे सर्वप्रकारका अजीर्ण नष्ट होता है ॥ ३ ॥

पथ्यात्रिक ।

पथ्यापिप्पलिसंयुक्तं चूर्णं सौवर्चलं पिबेत् । मस्तुनोष्णोदकेनाथ बुद्ध्वा दोषगतिं भिषक् ॥ ४ ॥ चतुर्विधमजीर्णं च मंदानलमथारुचिम् । आध्मानं वातगुल्मं च मलं चाशु नियच्छति ॥ ५ ॥

हरड, पीपल और कालानमक इनके चूर्णको समान भाग लेकर दहीके पानी अथवा उष्णजलके साथ दोषोंकी गतिको जानकर वैद्य पान करानेसे चारों प्रकारका अजीर्ण, मन्दाग्नि, अरुचि, अफाग, वातगुल्म और शूल ये सब तत्काल दूर होते हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥

विशिष्टद्रव्याजीर्णकी विधि ।

फलं पनसपाकाय फलं कदलसम्भवम् । कदलस्य तु पाकाय बुधैरपि घृतं हितम् ॥ घृतस्य परिपाकाय जम्बीरस्य रसो हितः ॥ ६ ॥ नारिकेलफलतालबीजयोः पाचकं सपदि तण्डुलं विदुः । क्षीरमेव सहकारपाचनं चारमज्जनि हरीतकी हिता ॥ ७ ॥