भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३७५
सोंठ, पीपल, मिरच, करंजुयेके फल, हल्दी और बिजौरेंनींबूकी जड इन सबको समान भाग लेकर जलमें खरल करके गोलियाँ बनाकर छायामें सुखा लेवे। इन गोलियोंको घिसकर आँखोंमें आँजनेसे विषूचिका नष्ट होती है ॥ ४ ॥
गुडपुष्पसारशिखरीतण्डुलगिरिकर्णिक हरिद्राभिः ।
अंजनगुडिका विलयति विषूचिकां त्रिकटुसंयुक्ता ॥ ५ ॥
महुएका सार, चिरचिटेके चावल, सफेद अपराजिताकी जड, हल्दी, सोंठ, पीपल और काली मिरच इन सबको एकत्र पीसकर गोलियाँ बनालेवे। यह गोली आँखोंमें आँजतेही विषूचिकारोगको दूर करती है ॥ ५ ॥
त्वक्पत्ररास्नागुरुशिग्रुकुष्ठरम्लप्रपिष्टैः सवचाशताह्नैः ।
उद्वर्त्तनं खल्लिविषूचिकाघ्नं तैलं विपक्वं च तदर्थकारि ॥ ६ ॥
दालचीनी, तेजपात, अगर, सहिजनेकी छाल, कूठ, वच और सोया इनको समान भाग लेकर काँजीमें पीसकर पेटपर मलनेसे खल्लीरोग और विषूचिका रोग नष्ट होता है। अथवा उक्त औषधियों और काँजीके द्वारा तिलके तैलको यथाविधि पकाकर मालिश करनेसे भी वैसाही गुण होता है ॥ ६ ॥
अलसकचिकित्सा ।
वमनं त्वलसे पूर्वं लवणेनोष्णवारिणा ।
स्वेदो वर्त्तिर्लङ्घनं च क्रमशश्चातोऽग्निवर्द्धनः ॥ १ ॥
अलसकरोगमें पहले सेंधानमक मिश्रित गरम जलपान कराकर वमन करावे फिर स्वेद, वर्त्ति, लंघन और अग्निवर्द्धक औषधियोंका प्रयोग इन क्रियाओंको क्रमपूर्वक कर ॥ १ ॥
उदरकी पीडाकी चिकित्सा ।
सरुक् चानद्धमुदरमम्लपिष्टैः प्रलेपयेत् ।
दारुहैमवतीकुष्ठशताह्वाहिङ्गुसैन्धवैः ॥ १ ॥
देवदारु, वच, कूठ, सौंफ, हींग और सेंधानमक इन औषधियोंको समान भाग लेकर काँजीमें पीसकर उदरपर प्रलेप करनेसे पेटकी पीडा और अफारा दूर होती है ॥ १ ॥
तक्रेण युक्तं यदचूर्णमुष्णं सक्षारमार्त्ति जठरे निहन्यात् ।
स्वेदो घटैर्वा बहुबाष्पपूर्णैरुष्णैस्तथाऽन्यैरपि पाणितापैः ॥ २ ॥
जौके चूर्णको मट्ठेमें सानकर और गरम करके नाभिके चारों ओर लेप करे अथवा मट्ठा, जौचूर्ण और जवाखार इन सबको एक घड़ेमें भरकर पकावे या हाथोंको