भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 408

३७६ | भैषज्यरत्नावली । | [ अग्निमान्द्य-

गरम करके पेटको बार बार सेक करनेसे इस प्रकार घड़ेमें गरम काँजी भरकर हल्के स्वेद देनेसे भी उदरकी पीड़ा दूर होती है ॥ २ ॥

तीव्रार्त्तिरपि नाजीर्णी पिबेच्छूलघ्नमौषधम् ।
दोषच्छन्नोऽनलो नालं पक्तुं दोषौषधाशनम् ॥ ३ ॥

अत्यन्त तीव्र पीड़ावाले अजीर्णरोगीको शूलनाशक औषधि कदापि सेवन नहीं करनी चाहिये । कारण, वातादि दोषोंसे ढकीहुई जठराग्नि दोषोंको और खाईहुई औषधिको पचानेके लिये समर्थ नहीं होती ॥ ३ ॥

सैन्धवाद्यचूर्ण ( १-२ ) ।

सिन्धूत्थपथ्यामगधोद्भववह्निचूर्णं-
मुष्णाम्बुना पिबति यः खलु नष्टवह्निः ।
तस्यामिषेण सघृतेन वरं नवान्नं
भस्मीभवत्यशितमात्रमिह क्षणेन ॥ ४ ॥

१ जो- पुरुष सैंधानमक, हरड, पीपल और चीतेकी जड़ इनके समान भाग चूर्णको गरम जलके साथ सेवन करता है उसकी नष्टहुई अग्नि अत्यन्त दीपन होजाती है । इस औषधिको सेवन करके घीमें भुनेहुए मांस इसके साथ नये चावलोंके भातको खानेपरभी वह तत्क्षण भस्म होजाता है ॥ ४ ॥

सैन्धवं चित्रकं पथ्या लवङ्गं मरिचं कणा ।
टङ्कणं नागरं चव्यं यमानी मधुरी वचा ॥ ५ ॥
द्रव्याणि द्वादशैतानि समभागानि चूर्णयेत् ।
भावयेन्निम्बुकद्रावैस्त्रिसप्ताहं प्रयत्नतः ॥ ६ ॥
ततो माषद्वयं चूर्णं वारिणोष्णेन पाचयेत् ।
सैन्धवेन सतक्रेण मस्तुना कांजिकेन वा ।
सैन्धवाद्यमिदं चूर्णं सद्यो वह्निं प्रदीपयेत् । ७ ॥

२-सैंधानमक, चीतेकी जड़, हरड, लौंग, काली मिरच, पीपल, सुहागा, सोंठ, चव्य, अजवायन, सौंफ और वच इन बारहों औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर नींबूके रसमें २१ दिनतक भावना देकर सुखालेवे । फिर उसमेंसे प्रतिदिन दो दो माशे परिमाण चूर्णको गरम जल, सैंधानमक मिला हुआ मट्ठा दहीका तोड़ अथवा काँजी इनमेंसे किसी एक अनुपानके साथ सेवन करे तो यह सैन्धवाद्य चूर्ण अग्निको तत्काल दीपन करता है ॥ ५-७ ॥