भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 418
३८६भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

रसश्चाग्निकुमारोऽयं महेशेन प्रकाशितः ।
महाग्निकारकश्चैव कालभास्करतेजसाम् ॥ ६३ ॥
अग्निमान्द्यभवान् रोगान् शोथं पाण्ड्वामयं जयेत् ।
दुर्नाम ग्रहणीं सामरोगान् हन्ति न संशयः ॥
यथेष्टाहारचेष्टस्य नास्त्यत्र नियमः क्वचित् ॥ ६४ ।

शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग, सुहागेकी खील २ भाग एवं हरड, आमला, बहेडा, जवाखार, सोंठ, पीपल, मिरच और पाँचों नमक ये बारहों औषधियें एक एक भाग लेवे । सबको एकत्र खरल करके अदरखके रसमें ७ बार भावना देवे फिर उसको सुखाकर चूर्ण करलेवे । इस रसको चार चार मासेकी मात्रासे अथवा अवस्थाका विचार करके आदरखके रसके साथ भक्षण करे तो इससे विविधप्रकारके अजीर्ण शमन होते हैं । इस बृहदग्निकुमार रसको महादेवजीने प्रकाशित किया है । यह इस कालाग्निके तेजकी समान जठराग्निको अत्यन्त दीपन करनेवाला एवं मन्दाग्निसे उत्पन्नहुए रोग, सूजन, पाण्डुरोग, बवासीर, संग्रहणी और आमयुक्त अनेक प्रकारके रोगोंको निश्चय नष्ट करनेवाला ह । इसपर यथेष्ट आहार विहार करना चाहिये । इसपर किसी प्रकारका परहेज नहीं है ॥ ६१-६४॥

हुताशनरस ।

गन्धेशटङ्कमेकैकं विषमत्र त्रिभागिकम् ।
अष्टभागं तु मरिचं जम्भाम्भोमर्दितं दिनम् ॥ ६५ ॥
तद्वटीं मुद्गमानेन कृत्वाऽऽद्रैण प्रयोजयेत् ।
शूलारोचकगुल्मेषु विषूच्यामग्निमान्द्यके ॥
अजीर्णसान्निपातादा शत्ये जाड्य शिरोगदे ॥ ६६ ॥

शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा और सुहागा प्रत्येक एक एक भाग, शुद्ध मीठातेलिया ३ भाग और मिरच ८ भाग इन सबको नींबूके रसमें एक दिनतक खरल करके मूँगकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इस रसकी एक एक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे शूल, अरुचि, गुल्म, विषूचिका, मन्दाग्नि, अजीर्ण, सन्निपात, शिथिलता, जडता और शिरोरोगमें अधिक लाभ होता है ॥ ६६ ॥

बृहद्धुताशन रस ।

एकद्विकद्वादशभागयुक्तं योज्यं विषं टङ्कणमूषणं च ।
हुताशनो नाम हुताशनस्य करोति वृद्धिं कफजिन्नराणाम् ॥