भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ३८५
रसं गन्धंच गरलं मेलयित्वा विभावयेत् ।
आर्द्रकस्य रसेनैव चित्रकस्य रसेन वा ॥ ५७ ॥
मुद्गप्रमाणां वटिकां कृत्वा खादेव दिनेदिने ।
क्षुत्प्रबोधकरी चेयं जीर्णज्वरविनाशिनी ॥ ५८ ॥
लौंग, चीतेकी जड, सोंठ, जमाल गोटा और सुहागा प्रत्येक एक एक तोला और विधारा २ तोले इन सबको एकत्र मिश्रित करके दन्तीके क्वाथमें १४ बार, कागजीनींबूके रसमें ३ बार और विधारेके रसमें ५ बार भावना दे । पश्चात् उसमें शुद्ध पारे और शुद्ध गन्धककी कज्जली २ भाग और शुद्ध वत्सनाभविष १ भाग मिलाकर अदरखके रसमें और चीतेके रसमें ७-७ बार खरल करके मूँगकी बराबर गोलियाँ तैयार करलेवे। इनमेंसे प्रतिदिन एक एक गोली खानेसे क्षुधाकी वृद्धि होती है ओर जीर्णज्वर दूर होता है ॥ ५५–५८ ॥
अग्निकुमाररस ।
रसेन्द्रगन्धौ सह टङ्कणेन समं विषं योज्यमिह त्रिभागम् ।
कपर्दशङ्खौविह नेत्रभागौ मरीचमत्राष्टगुणं प्रदेयम् ॥ ५९ ॥
सुपक्वजम्बीररसेन घृष्टः सिद्धो भवेदग्निकुमार एषः ।
विषूचिकाजीर्णसमीरणातैं दद्याद् द्विवल्लं ग्रहणीगदे च ॥ ६० ॥
“अत्र सर्वमेकभागापेक्षया वचनान्तरसंवादात् ”॥
पारे और गन्धककी कज्जली २ भाग, सुहागा १ भाग, शुद्ध मीठा तेलिया ३ भाग, कौडीकी भस्म ३ भाग, शंखकी भस्म ३ भाग और मिरच ८ भाग सबको एकत्र चूर्ण करके पकेहुए जम्भीरीनींबूके रसमें खरलकरे तो अग्नि कुमाररस सिद्ध होता है । इस रसको विषूचिका, अजीर्ण, वातविकार और संग्रहणीरोगमें दो दो रत्ती प्रमाण सेवन कराना चाहिये ॥ ५९ ॥ ६० ॥
बृहदग्निकुमाररस ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्धं गन्धतुल्यं च टङ्कणम् ।
फलत्रयं यवक्षारं व्योषं पञ्च पटूनि च ॥ ६१ ॥
द्वादशैतानि सर्वाणि रसतुल्यानि दापयेत् ।
संमर्द्य सप्तधा सर्वं भावयेदार्द्रकद्रवैः ।
संशोष्य चूर्णयित्वा तु भक्षयेदार्द्रकाम्बुना ।
शाणमात्रं वयो वीक्ष्य नानाऽजीर्णप्रशान्तये ॥ ६२ ॥
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