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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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४२८भैषज्यरत्नावली ।[ पाण्डु-आदि-

मारितं चायसं चूर्णं मुस्ताचूर्णेन संयुतम् ।
खदिरस्य कषायेण पिबेद्धन्तुं हलीमकम् ॥ १८ ॥
लोहेकी भस्मको नागरमोथेके चूर्ण और खैरके क्वाथके साथ मिलाकर सेवन करे तो हलीमकरोग नष्ट होता है ॥ १८ ॥

सितातिक्ताबलायष्टित्रिफलारजनीयुगैः ।
लौहं लिह्यात्समध्वाज्यं हलीमकनिवृत्तये ॥ १९ ॥
मिश्री, कुटकी, खिरेंटी, मुलहठी, त्रिफला, हल्दी और दारुहल्दी इन सबको समान भाग और सबकी बराबर लोह भस्म लेकर सबका एकत्र चूर्ण करलेवे फिर शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे हलीमकरोग दूर होता है ॥ १९ ॥

फलत्रिकादि-कषाय ।

फलत्रिकामृतावासातिक्ताभूनिम्बनिम्बजः ।
क्वाथः क्षौद्रयुतो हन्यात्पाण्डुरोगं सकामलम् ॥ २० ॥
त्रिफला, गिलोय, बिसौंटा, कुटकी, चिरायता और नीमकी छाल इनका काढ़ा बनाकर मधुके साथ सेवन करे तो पाण्डु और कामला नष्ट होते हैं ॥ २० ॥

वासादिकषाय ।

वासामृतानिम्बकिरातकट्वीकषायकोऽयं समधुर्निपीतः ।
सकामलं पाण्डुमथास्रपित्तं हलीमकं हन्ति कफादिरोगान् ॥
बिसौंटेकी छाल, गिलोय, नीमकी छाल, चिरायता और कुटकी इन सबका बराबर भाग लेकर यथाविधि क्वाथ बनाय शहद डालकर पान करे तो कामला पाण्डु, रक्तपित्त, हलीमक और कफादिरोग नष्ट होते हैं ॥ २१ ॥

नवायसलौह ।

त्र्यूषणत्रिफलामुस्तविडङ्गचित्रकाः समाः ।
नवायोरजसो भागास्तच्चूर्णं मधुसर्पिषा ॥ २२ ॥
भक्षयेत्पाण्डुहृद्रोगकुष्ठार्शःकामलापहम् ।
नवायसमिदं लौहं कृष्णात्रेयेण भाषितम् ॥ २३ ॥
त्रिकुटा, त्रिफला, नागरमोथा, वायविडङ्ग और चीतेकी जड़—ये सब औषधियाँ समान भाग और लोह भस्म ९ भाग लेकर सबका एकत्र बारीक, चूर्ण शहद और घीके साथ मिलाकर सेवन करनेसे पाण्डु, हृद्रोग कुष्ठ,

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