भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 461

कित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४२९


बवासीर और कामला ये सब रोग दूर होते हैं। इस नवायसलोहको कृष्णात्रेयने कहा है ॥ २२ ॥ २३ ॥

विशालौह ।

लौहचूर्ण निशायुग्मं त्रिफलारोहिणीयुतम् ।
प्रलिह्यान्मधुसर्पिर्भ्यां कामलापाण्डुशान्तये ॥ २४ ॥

हल्दी, दारुहल्दी, त्रिफला और कुटकी ये सब समान भाग और सबकी बराबर लोहेका चूर्ण एकत्र खरल करके शहद और घृतके साथ मिलाकर सेवन करनेसे पाण्डु और कामलारोग नष्ट होते हैं ॥ २४ ॥

धात्रीलौह ।

धात्रीलौहरजोव्योषनिशाक्षौद्राज्यशर्कराः ।
भक्षणाद्विनिहन्त्याशु कामलां च हलीमकम् ॥ २५ ॥

आमले, लोहभस्म, सोंठ, मिरच, पीपल और हल्दी इनके समान भाग चूर्णको शहद, घी और मिश्रीमें मिलाकर सेवन करनेसे कामला और हलीमक रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ २५ ॥

विडंगादिलौह ।

विडंगत्रिफलाव्योषं शुद्धलौहं तु तत्समम् ।
पुरातनगुडेनैव लेहयेद्दिनसप्तकम् ॥ २६ ॥
श्वयथुं नाशयेच्छीघ्रं पाण्डुरोगं हलीमकम् ॥ २७ ॥

वायविडंग, त्रिफला और त्रिकुटा इनको समान भाग और सबकी बराबर शुद्ध लोहेकी भस्म लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको पुराने गुडके साथ मिलाकर सात दिनतक सेवन करनेसे शोथ, पाण्डु और हलीमक रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥

विडंगमुस्तत्रिफलादेवदारुषडूषणैः ।
तुल्यमात्रामयश्चूर्णं गोमूत्रेऽष्टगुणे पचेत् ॥ २८ ॥
तैरक्षमात्रां गुटिकां कृत्वा खादेद्दिने दिने ।
कामलापाण्डुरोगार्त्तः सुखमापद्यतेऽचिरात् ॥ २९ ॥

वायविडंग, नागरमोथा, त्रिफला, देवदारु, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ और कालीमिरच ये सब औषधि समान भाग और इन सबको बराबर गोमूत्रमें शुद्ध कियाहुआ लोहचूर्ण लेवे । फिर सबको एकत्र पीसकर आठगुन गोमूत्रमें