भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 476
४४४भैषज्यरत्नावली ।[ रक्तपित्त-

पुराने शालिचावल, सांठी चावल, नीवार, ( लडियाधान, ) कोदों, लालनीवार, समा और कंगनी चावल ये सब अन्न रक्तपित्तवाले रोगियोंको भोजनके लिये देने चाहिये ॥ ४ ॥

मसूरमुद्गचणकाः मकुष्ठाढकीफलाः ।
प्रशस्ताः सूपयूषार्थं कल्पिता रक्तपित्तिनाम् ॥ ५ ॥

रक्तपित्तवाले रोगीको मसूर, मूँग, चने मोठ और अरहर इन सबकी दालोंका यूष देना चाहिये ॥ ५ ॥

शाकं पटोलवेत्राग्रतण्डुलीयादिकं हितम् ।
मांसं लावकपोतादिशशैणहरिणादिजम् ॥ ६ ॥

रक्तपित्तवाले रोगीको—पटोलपात, बेंतका अग्रभाग, चौलाई आदिका शाक एव लवा, कबूतर, खरगोश और काला हिरन आदि जीवोंका मांस हितकारी है ॥

क्षीणमांसबलं वृद्धं बालं शोषानुबन्धिनम् ।
अवम्यमविरेच्यं च स्तम्भनैः समुपाचरेत् ॥ ७ ॥

जिसका मांस और बल क्षीण होगया हो, एवं वृद्ध, बालक और जो शोष-रोगसे पीडित हो ऐसे रक्तपित्तरोगीको वमन आर विरेचन नहीं कराने चाहिये, किन्तु स्तंभन औषधिके द्वारा चिकित्सा करना चाहिये ॥ ७ ॥

वृषपत्राणि निष्पीड्य रसं समधुशर्करम् ।
पिबेत्तेन शमं याति रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ ८ ॥

अड़ूसेके पत्तोंको एक बर्त्तनमें भरकर और दूसरे बर्त्तनसे उसको ढककर कुछ देरतक अग्निपर गरम करे । फिर उनको निचोडकर रस निकाल लेवे । उसमेंसें दो दो तोल प्रमाण रसको शहद और मिश्रीमें मिलाकर पीनेसे दारुण रक्तपित्तरोग शमन होता है ॥ ८॥

समाक्षिकःफल्गुफलोद्भवो वा पीतो रसः शोणितमाशु हन्ति॥९॥

कठूमरके फलोंका रस २ तोले लेकर शहदमें मिलाकर पीनेसे रक्तपित्तरोग नष्ट होता है ॥ ९ ॥

अभया मधुसंयुक्ता पाचनी दीपनी मता ।
श्लेष्माणं रक्तपित्तं च हन्ति शूलातिसारनुत ॥ १० ॥

हरडको शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे आमका परिपाक होकर अग्नि दीपन होती है एवं कफ, रक्तपित्त, शूल और अतिसार आदि रोग शीघ्र दूर होते हैं१०॥