भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४४५
वासकस्वरसे पथ्या सप्तधा परिभाविता ।
कृष्णा वा मधुना लीढा रक्तपित्तं द्रुतं जयेत् ॥ ११ ॥
अडूसके रसमें हरडको सातवार भावना देकर सेवन करनेसे अथवा पीपलको शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग शीघ्र दूर होता है ॥ ११ ॥
पक्वोदुम्बरकाश्मर्यपथ्याखर्जूरगोस्तनाः ।
मधुना घ्नन्ति संलीढा रक्तपित्तं पृथक् पृथक् ॥ १२ ॥
गूलरके पके फल, कुम्भीर, हरड, खजूर और दाख ये सब औषधि रक्तपित्तरोगनाशक हैं। इसलिये रक्तपित्तको दूर करनेके लिये इनमेंसे किस। एक औषधिको शहदमें मिलाकर सेवन करे ॥ १२ ॥
खदिरस्य प्रियंगूनां कोविदारस्य शाल्मलेः ।
पुष्पं चूर्णं तु मधुना लिहन्नारोग्यमश्नुते ॥ १३ ॥
खैर, फूलप्रियंगु, कचनार और सेमल इनमेंसे किसी एकके फूलोंका चूर्ण शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे रक्तपित्तरोग दूर होता है ॥ १३ ॥
लाक्षाचूर्णं सुकृतं क्षौद्राज्यसमन्वितं सकृल्लीढम् ।
शमयति सोद्धतवमनं सरक्तपित्तस्य सिद्धमिदम् ॥१४॥
लाखका बारीक चूर्ण ६ मासे लेकर शहद और घीमें मिलाकर एकवार चाटनेसे ही वमन और रक्तपित्त दूर होता है ॥ १४ ॥
द्राक्षामधुककाश्मर्यसितायुक्तं विरेचनम् ।
यष्टीमधुकयुक्तं च सक्षौद्रं वमने हितम् ॥ १५ ॥
रक्तपित्तरोगमें-दाख, मुलहठी और कुम्भीर इनके चूर्णको मिश्रीमें मिलाकर विरेचनके लिये और मुलहठीके चूर्णको शहदमें मिलाकर वमनके लिये देना अत्युत्तम है ॥ १५ ॥
लङ्घितस्य ततः पेयां विदध्यात्स्वल्पतण्डुलाम् ।
तर्पणं पाचनं लेहान् सर्पींषि विविधानि च ॥ १६ ॥
लंघन करानेके पश्चात् थोडे चावलोंकी बनाई हुई पेया पान करावे फिर तर्पण पाचन, अवलेह और विविध प्रकारके घृत प्रयोग करे ॥ १६ ॥
तर्पणं सघृतक्षौद्रलाजचूर्णैः प्रदापयेत् ।
ऊर्ध्वगं रक्तपित्तं तत्पीतकाले व्यपोहति ॥ १७ ॥