भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४४७
तालीशचूर्णसहितः पेयः क्षौद्रेण वासकस्वरसः ।
कफपित्ततमकश्वासस्वरभेदरक्तपित्तहरः ॥ २४ ॥
अडूसके स्वरसमें तालीशपत्रका चूर्ण और शहद मिलाकर पीनेसे कफपित्त, तमकश्वास, स्वरभेद और रक्तपित्तरोग शमन होता है ॥ २४ ॥
वासायां विद्यमानायामाशायां जीवितस्य च ।
रक्तपित्ती क्षयी कासी किमर्थमवसीदति ॥ २५ ॥
रक्तपित्त, श्वास, क्षय और खाँसीवाले रोगियोंके लिये अडूसके समान अन्य हितकर औषधि नहीं है । इसलिये अडूसके विद्यमान रहतेहुए उक्त रोगवाले मनुष्य जीवनकी आशा करनेमें क्यों दुःखी होते हैं ? ॥ २५ ॥
मद्यन्त्यङ्घ्रिजः क्वाथस्तद्वत् समधुशर्करः ।
मोतियाकी जडके क्वाथमें शहद और मिश्री मिलाकर पीनेसे रक्तपित्त नष्ट होता है ॥
अतसीकुसुमसमङ्गा वटावरोहत्वगम्भसा पीता ।
प्रशमयति रक्तपित्तं यदि भुङ्क्ते मुद्गयूषेण ॥ २६ ॥
अलसीके फूल, लज्जावन्ती, वडके अंकुर और छाल इन सबको समान भाग लेकर जलके साथ पीसकर पान करनेसे और मूँगके यूषका पथ्य देनेसे रक्तपित्त शमन होता है ॥ २६ ॥
घ्राणप्रवृत्ते जलमाशु देयं सशर्करं नासिकया पयो वा ।
द्राक्षारसं क्षीरघृतं पिबेद्वा सशर्करं चेक्षुरसं हितं वा ॥ २७ ॥
नासिकाके द्वारा रक्तस्राव होनेपर तत्काल जलको अथवा दूधको शर्करा मिलाकर नासिकाद्वारा पान करे । अथवा दाखोंका स्वरस ( या क्वाथ ) या दूधमेंसे निकला हुआ घी अर्थात् मक्खन, अथवा ईखका रस मिश्री मिलाकर नासिकासे पान करना हितकर है ॥ २७ ॥
नस्य दाडिमपुष्पाख्यो रसो दूर्वाभवोऽथवा ।
आम्रास्थिजः पलाण्डोर्वा नासिकास्रुतरक्तजित् ॥ २८ ॥
अनारके फूलोंका रस अथवा दूबका स्वरस आमकी गुठलीका चूर्ण अथवा प्याजका स्वरस इनमेंसे किसी एक रसका नस्य लेनेसे नासिकाके द्वारा रक्तका स्राव होना दूर होता है ॥ २८ ॥