भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 480, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 480
४४८भैषज्यरत्नावली ।[ रक्तपित्त -

रसो दाडिमपुष्पस्य दूर्वारससमन्वितः ।
अलक्तकरसोपेतः पथ्यया वा समन्वितः ॥ २९ ॥
योजितो नस्यतः क्षिप्रं त्रिदोषमपि देहिनाम् ।
नासाप्रवृत्तं रक्तं तु हन्यादेव न संशयः ॥ ३० ॥
अनारके फूलोंका स्वरस और दूबका स्वरस दोनोंको एकत्र मिलाकर अथवा आलका क्वाथ और हरडका क्वाथ मिलाकर नस्य देनेसे त्रिदोषजनित नासिका-गत रक्तस्राव निस्सन्देह तत्काल बन्द होता है ॥ २९ ॥ ३० ॥

नासाप्रवृत्तरुधिरं घृतभृष्टं श्लक्ष्णपिष्टमामलकम् ।
सेतुरिव तोयवेगं रुन्ध्याद्ध मूर्ध्नि प्रलेपेन ॥ ३१ ॥
आंमलोंको खूब बारीक पीसकर और घीमें भूनकर मस्तकपर लेप करे तो नासिकासे होनेवाला रक्तस्राव इस प्रकार तत्काल नष्ट होता है, जैसे पुलके द्वारा जलका वेग रुक जाता है ॥ ३१ ॥

मेढ्रगेऽतिप्रवृत्ते तु वस्तिरुत्तरसंज्ञितः ।
शृतं क्षीरं पिबेद्वापि पञ्चमूल्या तृणाह्वया ॥ ३२ ॥
लिंगके द्वारा रक्तका स्राव होनेपर प्रथम वस्तिक्रिया करे । फिर पंच तृणमूल (कुशा, काँस, रामरस, काली ईख और धान पाँचोंकी जडको पंच तृणमूल कहते हैं ) को दूधमें औटाकर पान करे तो लिंगगत रक्तपित्त रोग दूर होता है ॥ ३२ ॥

ह्रीबेरादि ।

ह्रीबेरमुत्पलं धान्यं चन्दनं यष्टिकाऽमृताः ।
उशीरं च त्रिवृच्चैषां क्वाथं समधुशर्करम् ॥ ३३ ॥
पाययेत्तेन सद्यो हि रक्तस्रुतिः प्रशाम्यति ।
रक्तपित्तं जयत्युग्रं तृष्णां दाहं ज्वरं तथा ॥ ३४ ॥
सुगन्धवाला, नीलकमल, धनियाँ, लालचन्दन, मुलहठी, गिलोय, खस और निसोथ इनके क्वाथको शहद और चीनी मिलाकर पान करानेसे दारुण रक्तपित्त, रुधिरका स्राव, तृषा, दाह और ज्वर ये सब रोग नष्ट होते हैं ३३ ॥ ३४ ॥

वासकादि ।

वासापत्रसमुद्भूतो रसः समधुशर्करः ।
क्वाथो वा हरते पीतो रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ ३५ ॥