भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४४९
अडूसेके पत्तोंका स्वरस अथवा क्वाथ शहद और मिश्री मिलाकर पान करनेसे अत्यन्त दारुण रक्तपित्तरोग दूर होता है ॥ ३५ ॥
धान्यकादि । धान्याकधात्रीवासानां द्राक्षापर्पटयोर्हिमः । रक्तपित्तं ज्वरं दाहं तृष्णां शोषं च नाशयेत् ॥ ३६ ॥ धनियाँ, आमले, अडूसेके पत्ते, दाख और पित्तपापडा इनके शीतल क्वाथको शहद और मिश्री मिलाकर पीनेसे रक्तपित्त, ज्वर, दाह, तृषा और शोष आदि रोग नष्ट होते हैं ॥ ३६ ॥
अटरूषकादि । अटरूषकमृद्वीकापथ्याक्वाथः सशर्करः । क्षौद्राढ्यः श्वसनोत्क्लेशरक्तपित्तनिवारणः ॥ ३७ ॥ अड़ूसा, दाख और हरड इनके क्वाथमें चीनी और शहद डालकर पान करनेसे कठिनतासे श्वासका लेना, रक्तवमन, रक्तपित्त आदि रोग निवृत्त होते हैं ॥ ३७ ॥
उशीरादिचूर्ण । उशीरं तगरं शुण्ठी कङ्कोलं चन्दनद्वयम् । लवङ्गं पिप्पलीमूलं कृष्णैला नागकेशरम् ॥ ३८ ॥ मुस्ता मधुककर्पूरं तुगाक्षीरी च पत्रकम् । कृष्णागुरुसमं चूर्णं सिता चाष्टगुणा तथा । रक्तवान्तिं च तापं च नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ३९ ॥ खस, तगर, सोंठ, कङ्कोल, सफेद चन्दन, लाल चन्दन, लवङ्ग, पिपलामूल, बडी इलायची, नागकेशर, नागरमोथा, मुलहठी, कपूर, वंशलोचन और तेजपात इन सब औषधियोंका चूर्ण समान भाग और काली अगरका चूर्ण सम्पूर्ण चूर्णके बराबर भाग लेवे । फिर अगरके चूर्णसहित सब चूर्णसे अठगुनी मिश्री मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल छः छः माशे परिमाण सेवन करे । इसका सेवन करनेसे रक्तवमन और शरीरका दाह नष्ट होता है ॥ ३८–३९ ॥
एलादिगुटिका । एलापत्रत्वचोऽर्द्धांक्षाः पिप्पल्यर्द्धपलं तथा । सितामधुकखर्जूरमृद्वीकाश्च पलोन्मिताः ॥ ४० ॥
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