भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 482, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४५० | भैषज्यरत्नावली । | [ रक्तपित्त- |
|---|
सञ्चूर्णय मधुना युक्तां गुटिकां कारयेद्भिषक् ।
अक्षमात्रां ततश्चैकां भक्षयेच्च दिने दिने ॥ ४१ ॥
इलायची १ तोला, तेजपात १ तोला, दालचीनी १ तोला, पीपल दो तोले और मिश्री, मुलहठी, खजूर और दाख ये प्रत्येक चार चार तोले लेवे। इन सबका एकत्र चूर्ण करके शहदके साथ खरल कर एक एक तोलेकी गोलियाँ बनालेवे। इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःसमय एक एक गोली सेवन करे ॥ ४० ॥ ४१ ॥
श्वासं कासं ज्वरं हिक्कां छर्दिं मूर्च्छां मदं भ्रमम् ।
रक्तनिष्ठीवनं तृष्णां पार्श्वशूलमरोचकम् ॥ ४२ ॥
शोषप्लीहामवातांश्च स्वरभेदं क्षतक्षयम् ।
गुटिका तर्पणी वृष्या रक्तपित्तं विनाशयेत् ॥ ४३ ॥
इसको सेवन करनेसे श्वास, खाँसी, ज्वर, हिचकी, वमन, मूर्च्छा, मद, भ्रम, रुधिरका थूकना, तृषा, पसलीकी पीडा, अरुचि, शोषरोग, तिल्ली, आमवात, स्वर-भेद, क्षतक्षय और रक्तपित्तादि सब रोग नष्ट होते हैं। यह वटी वीर्यवर्द्धक और तृप्तिकारक है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥
अर्केश्वररस ।
मृतार्कं मृतवङ्गं च मृताभ्रं च समाक्षिकम् ।
अमृतास्वरसैर्भाव्यं त्रिसप्तकपुटे पचेत् ॥ ४४ ॥
वासाक्षीरविदारीभ्यां चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः ।
भक्षणाद्विनिहन्त्याशु रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ ४५ ॥
ताम्रभस्म, वङ्गभस्म, अभ्रकभस्म और सोनामाखीकी भस्म इन सबको समान भाग लेकर गिलोयके स्वरसमें २१ बार भावना देवे, फिर सम्पुटमें रखकर पकावे तो अर्केश्वर रस सिद्ध होता है। इसको चार चार रत्तीकी मात्रासे अडूसा और दूध विदारीकन्दके स्वरस वा क्वाथके साथ प्रतिदिन सेवन करनेसे अत्यन्त दारुण रक्त-पित्तरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ४४ ॥ ४५ ॥
रक्तपित्तान्तकरस ।
मृताभ्रं मृततीक्ष्णं च माक्षिकं रसतालकम् ।
गन्धकं च भवेत्तुल्यं यष्टिद्राक्षामृताद्रवैः ॥ ४६ ॥
दिनैकं मर्दयेत्खल्ले सिताक्षौद्रसमन्वितम् ।
माषमात्रं निहन्त्याशु रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥
ज्वरं दाहं क्षतक्षीणं तृष्णां शोषमरोचकम् ॥ ४७ ॥