भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें·४६० भैशज्यरत्नावली । [ रक्तपित्त-
वासाद्यघृत ।
वासां सशाखां सफलां समूलां
कृत्वा कषायं कुसुमानि चास्याः ।
प्रदाय कल्कं विपचेद् घृतं च
क्षौद्रेण पानाद्विनिहन्ति रक्तम् ॥ २ ॥
( “शणस्य कोविदारस्यवृषस्य ककुभस्य च ।
कल्काढचत्वान्पुष्पकल्कं प्रस्थे पलचतुष्टयम् ” ॥ )
शाखा, फल और जडसहित अडूसेको ४ सेर लेकर ३२ सेर जलमें पकाकर ८ सेर जल शेष रक्खे । फिर उस क्वाथमें अडूसेके फूलोंका कल्क आठ तोले और गोघृत १ सेर डालकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । इस घृतको शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे रक्तपित्त नष्ट होता है । ( किसी २ के मतसे इसमें-सन, कचनार, अडूसा और अर्जुन-इनक फूलोंका कल्क चार पल, घी १ प्रस्थ डालकर घृतको पकाना चाहिये ) ॥ २ ॥
दूर्वाद्यघृत ।
दूर्वा सोत्पलकिंजल्का मञ्जिष्ठा सैलवालुका ।
सिता शीतमुशीरं च मुस्तं चन्दनपद्मकम् ॥ ३ ॥
विपचेत्कार्षिकैरेतैः सर्पिराजं सुवाग्निना ।
तण्डुलाम्बु त्वजाक्षीरं दत्त्वा चैव चतुर्गुणम् ॥ ४ ॥
तत्पानं वमतो रक्तं नावनं नासिकागते ।
कर्णाभ्यां यस्य गच्छेत्तु तस्य कर्णौ प्रपूरयेत् ॥ ५ ॥
चक्षुःस्राविणि रक्ते च पूरयेत्तेन चक्षुषी ।
मेढ्रपायुप्रवृत्ते च वस्तिकर्मसु तद्धितम् ॥
रोमकूपप्रवृत्ते तु तदभ्यङ्गे प्रयोजयेत् ॥ ६ ॥
दूब, कमल, कमलकी केशर, मँजीठ, एलुआ, मिश्री, सफेद चन्दन, खस, नागरमोथा, लालचन्दन ओर पद्माख-- प्रत्येक ओषधि एक एक कर्ष एवं चावलोंका जल और बकरिका दूध सब औषधियोंसे चौगुना, बकरीका घी १ सेर लेवे । सबको एकत्र मिलाकर यथाविधि मन्द मन्द अग्निके द्वारा घृतको सिद्ध करें। इस दूर्वाद्यघृतको-वमनके द्वारा रक्तस्राव होनेपर पान करे, नासिकाके द्वारा