भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४६१

रुधिरका स्राव होनेपर नस्य देवे । कानामैसे रक्तस्राव हो तो इस घृतको कानोंमें डाले । नेत्रोंमेंसे रुधिरका स्राव होनेपर नेत्रोंमें भरे, जो लिङ्ग और गुदाके द्वारा रक्तस्राव हो तो इस घृतकी पिचकारी लगावे और रोमकूपोंके द्वारा रक्तस्राव होय तो इस घृतकी शरीरमें मालिश करे ॥ ३-६ ॥

सप्तप्रस्थघृत ।

शतावरीपयोद्राक्षाविदारीक्ष्वामलै रसैः ।
सर्पिषा सह संयुक्तैः सप्तप्रस्थं पचेद् घृतम् ॥ ७ ॥
शर्करापादसंयुक्तं रक्तपित्तहरं पिबेत् ।
उरःक्षते पित्तशूले चोष्णवातेऽप्यसृग्दरे ।
बल्यमोजस्करं वृष्यं क्षयहृद्रोगनाशनम् ॥ ८ ॥

शतावर, सुगन्धवाला, दाख, विदारीकन्द, ईख और आमले इन सबका स्वरस और गोघृत ये प्रत्येक एक एक प्रस्थ लेवे । सबको घृतके साथ मिलाकर यथा-विधि घृतको पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब उसमें १६ तोले शुद्ध खांड मिलादेवे । इस घृतको प्रतिदिन छः छः मासे पान करनेसे रक्तपित्त, क्षय और हृदयरोग दूर होता है । यह घृत उरःक्षत, पित्तशूल उष्णवात और रक्त-प्रदर रोगोंमें हितकारी एवं बल, ओज और वीर्यकी अत्यन्त वृद्धि करता है तथा क्षय और हृदयरोगको नष्ट करता है ॥ ७ ॥ ८ ॥

शतावरीघृत ।

शतावर्यास्तु मूलानां रसं प्रस्थद्वयं मतम् ।
तत्समं च भवेत्क्षीरं घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ९ ॥
जीवकर्षभकौ मेदा महामेदा तथैव च ।
काकोली क्षीरकाकोली मृद्वीकामधुकं तथा ॥ १० ॥
मुद्गपर्णी माषपर्णी विदारी रक्तचन्दनम् ।
शर्करामधुसंयुक्तं सिद्धं विस्रावयेद् घृतम् ॥ ११ ॥

शतावरका रस दो प्रस्थ, गौका दूध दो प्रस्थ, उत्तम घृत १ प्रस्थ तथा जीवक ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली दाख, मुलहठी, मुगवन, मषवन, विदारीकन्द और लालचन्दन इनका कल्क १६ तोले डालकर घृतको सिद्ध करे । जब घृत अच्छे प्रकारसे सिद्ध होजाय तब उसमें सोलह-सोलह तोले मिश्री और शहद मिलाकर उतार लेवे ॥ १०९-१११ ॥