भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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१८ | भैषज्यरत्नावली । | [ चिकित्सा-


मुख्यभेषजसम्बन्धो निषिद्धस्तरुणज्वरे । तोयपेयादिसंस्कारैर्निर्दोषं तेन भेषजम् ॥ ९६ ॥

तरुण ज्वरमें-एक सप्ताह्तक प्रधान ओषधि नहीं देनी चाहिये । किन्तु पूर्वोक्त नागरमोथादि छः द्रव्योंके द्वारा सिद्ध कियेहुए अप्रधानौषधरूप षडंग जलको सेवन करानेमें कोई हानि नहीं है। जल और मण्डादिके संस्कारके लिये जो ओषधियाँ व्यवहार की जाती हैं, उनको अप्रधान ओषधि कहते हैं। यह अप्रधान ओषधिही प्रथम सप्ताहमें सेवन करायी जासकती हैं। किंतु ज्वरनाशक मुख्य ओषधियाँ सप्ता-हके भीतर नहीं सेवन करानी चाहिये ॥ ९६ ॥

षडङ्गादि साधन ।

यदप्सु श्रुतशीतासु षडङ्गादि प्रयुज्यते । कर्षमात्रं ततो द्रव्यं साधयेत्प्रास्थिकेऽम्भसि ॥ ९७ ॥ अर्द्धं श्रुतं प्रयोक्तव्यं पाने पेयादिसंविधौ । लाजपेयां सुखजरां पिप्पलीनागरैः शृताम् ॥ ९८ ॥ पिबेज्ज्वरी ज्वरहरां क्षुद्वानल्पाग्निश्रदितः । पेयां वा रक्तशालीनां पार्श्ववस्तिशिरोरुजि ॥ ९९ ॥ श्वदंष्ट्राकण्टकारीभ्यां सिद्धां ज्वरहरीं पिबेत् । षडङ्गपरिभाषैव प्रायः पेयादिसम्मता ॥ १०० ॥

षडंग जल बनाना हो या यूष, यवागू, मंड, पेया आदि बनाना हो तो षडंगादि ओषधियोंको एक कर्ष (दो तोले) लेकर एक प्रस्थ जलमें पकावे । जब पककर आधा जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर शीतल होनेपर पान और पेयादिमें प्रयोग करे । पीपल और सोंठके काथके द्वारा सिद्ध की हुई खीलोंकी पेया ज्वरनाशक है और सहजमें परिपक्व होनेके कारण मन्दाग्निवाला पुरुष अल्प क्षुधामें भी सेवन कर सकता है। ज्वर रोगीके पसली मूत्राशय और शिरमें पीडा होनेपर गोखरू और कटेरीके द्वारा बनाई हुई लाल शालि धानोंकी पेया सेवन करानी चाहिये । यह पेया ज्वरको दूर करती है । षडंगजलकी परिभाषाके अनुसारही प्रायः पेयादि सिद्ध की जाती है ॥ ९७-१०० ॥

यवागूमुचिताद्भक्ताच्चतुर्भागकृतां वदेत् ॥ १०१ ॥

यवागूकी मात्रा स्वभावसे जितने परिमाणमें चावल खानेका अभ्यास हो, उसके चौथाई भाग कुटे हुए चावलोंके द्वारा मांड, पेया और विलेपी प्रस्तुत करानी चाहिये ॥ १०१ ॥