भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १९


माँड आदिके लक्षण ।

सिक्थकै रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता ।
यवागूर्बहुसिक्था स्याद्विलेपी विरलद्रवा ॥ २ ॥
जिसमें एक भी सीत न रहे (अर्थात् सब कण गल जायँ) उसे मण्ड कहते हैं । जिसमें कुछ सीत रहजायँ उसको पेया कहते हैं । और जिसमें बहुतसे सीत हों उसको यवागू और जिसमें पतलापन हो, उसको विलेपी कहते हैं ॥ २ ॥

अन्नादिसाधन ।

अन्नं पञ्चगुणे साध्यं विलेपी च चतुर्गुणे ।
मण्डश्चतुर्दशगुणे यवागूः षड्गुणेऽम्भसि ॥
अष्टादशगुणे तोये यूषः शार्ङ्गधरेरितः ॥ ३ ॥
भात सिद्ध करना हो तो चावलोंको पचगुने जलमें पकावे । विलेपीको चौगुने जलमें, मांडको चौदह गुने जलमें, यवागूको ६ गुने जलमें और यूषको १८ गुने जलमें पकावे. ऐसा शार्ङ्गधरने कहा है ॥ ३ ॥

ज्वरमें पथ्य ।

श्रमोपवासानिलजे हितो नित्यं रसौदनः ।
मुद्गयूषौदनश्चापि देयः कफसमन्विते ॥ ४ ॥
स एव सितया युक्तः शीतपित्तज्वरे हितः ।
रक्तशाल्यादयः शस्ताः पुराणाः षष्टिकैः सह ॥ ५ ॥
यवाग्वोदनलाजार्थं ज्वरितानां ज्वरापहाः ।
मुद्गान्मसूँराँश्चणकान् कुलित्थान् समकुष्ठकान् ॥ ६ ॥
आहारकाले यूषार्थं ज्वरिताय प्रदापयेत् ।
पटोलपत्रं वार्ताकं कुलकं कारवेल्लकम् ॥ ७ ॥
कर्कोटकं पर्पटकं गोजिह्वां बालमूलकम् ।
पत्रं गुडूच्याः शाकार्थे ज्वरिताय प्रदापयेत् ॥ ८ ॥
परिश्रम, लंघन और वायुके प्रकोपसे उत्पन्नहुए ज्वरमें मांसरसके साथ भात खाना हितकारी है । कफज्वरमें-मूँगके यूषके साथ और पित्तज्वरमें-भातमें मिश्री मिलाकर ठंडे मूँगके यूषके साथ सेवन करे. ज्वररोगीको पुराने लाल शालिधान और साँठी

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