भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० भैशज्यरत्नावली । [ चिकित्सा-
आदि धानोंके द्वारा प्रस्तुत की हुई यवागू, भात और खीलें हितकर और ज्वरनाशक हैं। मूँग, मसूर, चना, कुलथी और मोठ आदिका यूष और परवल, बैंगन, मरसा-करेला, ककोडा, पित्तपापडा, गोजिया, कच्चीमूली और गिलोयके पत्ते आदिका शाक ज्वररोगीको देवे ॥ ४-८ ॥
ज्वरितो हितमश्नीयाद् यद्यप्यस्यारुचिर्भवेत् ।
अन्नकाले ह्यभुञ्जानः क्षीयते म्रियतेऽपिवा ॥ ९ ॥
सातत्यात् स्वादभावाद्वा पथ्यं द्वेष्यत्वमागतम् ।
कल्पनाविधिभिस्तैस्तैः प्रियत्वं गमयेत्पुनः ॥ १० ॥
ज्वररोगीको, भोजनमें अरुचि होनेपर भी हितकर पदार्थोंका भोजन करावे, कारण—जो रोगी नियमित समयमें हितकर भोजन नहीं करता, उसका शरीर क्रमशः क्षीण होजाता है अथवा मृत्यु होजाती है। यदि निरन्तर एक ही प्रकारके पदार्थोंके आहारसे वा पदार्थोंके स्वादु न होनेसे रोगीको भोजनमें अरुचि हो तो उसकी रुचि के अनुसार नानाप्रकारके पथ्योंकी कल्पना करके दे ॥ ९ ॥ १० ॥
ज्वरितं ज्वरमुक्तं वा दिनान्ते भोजयेल्लघु ।
श्लेष्मक्षये विवृद्धोष्मा बलवाननलस्तदा ॥ ११ ॥
ज्वर होनेपर अथवा ज्वरके उतरजानेपर सायंकालमें रोगीको हल्का भोजन देना चाहिये क्योंकि उस समय कफके क्षीण होनेसे अग्नि-दीपन और बलवती होती है ॥ ११ ॥
गुर्वभिष्यन्द्यकाले च ज्वरी नाद्यात्कथंचन ।
नहि तस्याहितं भुक्तमायुषे वा सुखाय वा ॥ १२ ॥
ज्वररोगी—भारी और अभिष्यन्दि ( शरीरके स्रोतोंको बन्द करनेवाले ) पदार्थों का अथवा असमयमें कदापि भोजन न करे। क्योंकि अहितकर पदार्थोंका भोजन करनेसे आयु और सुखका नाश होता है ॥ १२ ॥
लंघनं स्वेदनं कालो यवागूस्तिक्तको रसः ।
पाचनान्यविपक्वानां दोषाणां तरुणज्वरे ॥ १३ ॥
नवीन ज्वरमें—लंघन, स्वेदन ( शरीरको बफारा देकर पसीना निकालना ), काल ( आठ दिन ), यवागू ( मांड, पेया और विलेपी ) और तिक्त पदार्थोंका विरस ये सब अपक्वादि दोषोंको पचानेवाले हैं ॥ १३ ॥