भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । २१
ज्वरकी तीन अवस्था ।
आसप्तरात्रं तरुणं ज्वरमाहुर्मनीषिणः ।
मध्यं द्वादशरात्रं तु पुराणमत उत्तरम् ॥ १४ ॥
ज्वर तीन प्रकारका होता है । जैसे—तरुणज्वर, मध्यमज्वर और पुरातनज्वर । ज्वरोत्पत्तिसे लेकर सात दिनतक तरुणज्वर, आठवें दिनसे लेकर बारह दिनतक मध्यम ज्वर और १२ वें दिनसे लेकर आगेको जो ज्वर स्थायी रूपसे रहता है, उसको पुरातन ज्वर कहते हैं ॥ १४ ॥
जीर्णज्वरके लक्षण ।
त्रिसप्ताहव्यतीतस्तु ज्वरो यस्तनुतां गतः ।
प्लीहाग्निसार्दं कुरुते स जीर्णज्वर उच्यते ॥ १५ ॥
तीन सप्ताह (२१ दिन) बीतनेपर जब ज्वरका वेग कम होकर प्लीहा (तिल्ली) की वृद्धि और मन्दाग्नि होजाता है तब उसे जीर्णज्वर कहते हैं ॥ १५ ॥
ज्वररोगीको कषाय पिलानेका नियम ।
ज्वरितं षडहेऽतीते लघ्वन्नंप्रतिभोजितम् ।
पाचनं शमनीयं वा कषायं पाययेत्तु तम् ॥ १६ ॥
सप्ताहात्परतोऽस्तब्धे सामे स्यात्पाचनं ज्वरे ।
निरामे शमनं स्तब्धे सामे नौषधमाचरेत् ॥ १७ ॥
ज्वरके ६ दिन बीत जानेपर सातवें दिन रोगीको हलका भोजन (यवागू आदि) कराकर आठवें दिन पाचन व शमनरूप कषाय पान करावे । किन्तु सात दिनके पश्चात् यदि ‘लाला प्रसेकादि’ आमज्वरके लक्षण हों और मलमूत्रादिका विबन्ध न हो तो शरीरशुद्धिके लिये पाचन ओषधि सेवन करावे । और निराम अवस्थामें शमनकारक ओषधि प्रयोग करे । यदि रस आमावस्थामें हो और मल-मूत्रका विबन्ध हो सप्ताहके पश्चात् तो पाचन या शमन ओषधियोंका प्रयोग न करे ॥ १६ ॥ १७ ॥
आमज्वरके लक्षण ।
लालाप्रसेको हृल्लासहृदयाशुद्ध्यरोचकाः ।
न्द्रालस्यविपाकास्यवैरूप्यं गुरुगात्रता ॥ १८ ॥