भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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४६८ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग-


उपद्रवा ज्वराद्यास्ते साध्याः स्वैः स्वैश्चिकित्सितैः ।
तेषु शान्तेषु रोगेषु पश्चाच्छोषमुपाचरेत् ॥ २ ॥
यदि यक्ष्मरोगमें ज्वर आदि उपद्रव उत्पन्न हों तो उनकी चिकित्सा उन्हीं २ रोगोंके अधिकारमें कहीहुई विधिके अनुसार करनी चाहिये । उन सम्पूर्ण रोगोंके शमन होनेपर फिर यक्ष्मरोगकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २ ॥

शालिषष्टिकगोधूमयवमुद्गादयः शुभाः ।
मद्यानि जाङ्गलाः पक्षिमृगाः शस्ता विशुष्यताम् ॥३॥
शुष्यतां क्षीणमांसानां कल्पितानि विधानवित् ।
दद्यात्क्रव्य,दमांसानि बृंहणानि विशेषतः ॥ ४ ॥
एक वर्षसे अधिक पुराने शालिधान और साठी धानोंके चावल, गेहूँ, जौ, मूँग, मद्य, जांगलदेशके पशु और पक्षियोंका मांस ये सब यक्ष्मरोगीके लिये हितकर हैं । यक्ष्मरोगमें यदि रोगीका बल और मांस क्षीण होगया हो तो व्याघ्र और गिद्ध आदिके मांसको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार विविध प्रकारकी कल्पनाओं द्वारा सिद्ध करके देवे और विशेषकर पौष्टिक पदार्थ देवे । ये सब मांसवर्द्धक, बलकारक और पौष्टिक हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥

दोषाधिकानां वमनं शस्यते सांविरेचनम् ।
स्नेहस्वेदोपपन्नानां सस्नेहं यन्न कर्षणम् ॥ ५ ॥
अधिक दोषोंवाले यक्ष्मरोगियोंको प्रथम स्वेद देकर और स्नेह ( घृत-तैलादि पान कराकर सस्नेह मृदु वमन और विरेचन कराने चाहिये । किन्तु ऐसा उपाय करे जिससे रोगी दुर्बल और कृश न हो ॥ ५ ॥

बलिनो बहुदोषस्य पञ्च कर्माणि कारयेत् ।
यक्ष्मिणः क्षीणदेहस्य तत्कृतं स्याद्विषोपमम् ॥ ६ ॥
दोषोंकी अधिकता हो तो बलवान् यक्ष्मरोगीके पञ्चकर्म ( अर्थात् वमन, विरेचन, अनुवासनबस्ति, निरूहणबस्ति और नस्यकर्म ) का प्रयोग करना चाहिये । किन्तु बल हीन और क्षीण रोगीके लिये उक्त सम्पूर्ण क्रियायें विषकी समान हानिकर हैं ॥ ६ ॥

शुद्धकोष्ठस्य युञ्जीत विधिं बृंहणदीपनम् ।
शुक्रायत्तं बलं पुंसां मलायत्तं हि जीवनम् ॥
तस्माद्यत्नेन संरक्षेद्यक्ष्मिणो मलरतेसी ॥ ७ ॥