भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४६७
फुहारेवाले और शीतल भूमिगृहमें निवास, वैदूर्यमणि और मोतियोंकी मालाको धारण करना, केलेके पत्तों, कुमुदके पत्तों और कमलके पत्तोंपर शयन करना, रेशमी वस्त्रोंका पहरना, शीतल वायुयुक्त बगीचेमें भ्रमण, फूलप्रियंगु और चन्दनसे सुगन्धित अङ्गोंवाली कामिनी स्त्रियोंके साथ आलिङ्गन करना, खिले हुए कमलोंसे युक्त नदियों और तालाब, चाँदनी युक्त बरफके कणोंसे शीतलपर्वतोंकी गुफाओंमें निवास, पर्वतके झरनोंका जलपान, कर्णप्रिय गीत और वाद्योंका सुनना, निर्मल जल और कपूर ये सब पदार्थ रक्तपित्तरोगवाले मनुष्योंके लिये हितकारी हैं ॥ १४२-१४५ ॥
रक्तपित्तमें अपथ्य ।
व्यायामाध्वनिषेवणं रविकरस्तीक्ष्णानि कर्म्माणि च क्षोभो वेगविधारणं चपलता हस्त्यश्वयानानि च । स्वेदास्रस्रुतिधूमपानसुरतक्रोधाः कुलत्थो गुडो वार्त्ताकुस्तिलमाषसर्षपदधिक्षाराणि कौपं पयः ॥ ताम्बूलं नलदाम्बुमद्यलशुनाः शिम्बी विरुद्धाशनं कट्वम्लं लवणं विदाहि च गणस्त्याज्योऽस्रपित्ते नृणाम्॥४६
कसरत आदि परिश्रम, अधिक रास्ता चलना, तीक्ष्ण धूपका सेवन, कठिन काम करना, क्षोभ, मल मूत्र आदिके वेगको रोकना, चञ्चलता, हाथी, घोडे आदिकी सवारीपर चढकर चलना, स्वेद निकलवाना, रुधिर निकलवाना, धूम्रपान, स्त्रीप्रसङ्ग, क्रोध, कुलथी, गुड, बैंगन, तिल, उडद, सरसों, दही, क्षारवाले पदार्थ, कुएका जल, ताम्बूल, नीम, मदिरा, लहसुन, सेमकी फली, विरुद्ध भोजन, चरपरे, खट्टे, अधिक लवणरसवाले और दाहकारक पदार्थ ये सब रक्तपित्त रोगवाले मनुष्योंको त्यागदेने चाहिये ॥ १४६ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां रक्तपित्तचिकित्सा ॥
अथ यक्ष्मरोगचिकित्सा ।
ज्वराणां शमनीयो यः पूर्व्वमुक्तः क्रियाविधिः ।
क्षयिणां ज्वरदाहेषु स सर्वोऽपि प्रशस्यते ॥ १ ॥
ज्वरकी चिकित्सा में जो संशमनविधि कही है वह समस्त विधि क्षयरोग ज्वर और दाहमें करनी चाहिये ॥ १ ॥