भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४८० | भैषज्यरत्नावली । | [ यक्ष्मरोग- |
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मातुलुङ्गवरावह्नित्वम्लवेतसमार्कवैः ।
हयमारार्द्रकरसैः पाचितो लघुवह्निना ॥ ७५ ॥
अभ्रकभस्म, रससिन्दूर, लोहभस्म, ताम्रभस्म, शीशेकी भस्म, काँसेकी भस्म, मण्डूरभस्म, रूपामाखीकी भस्म, शुद्ध मैनसिल, वङ्गभस्म, शुद्ध खपरिया, हरतालभस्म, शंखभस्म, सुहागा, सोनामाखीकी भस्म, वैक्रान्तकी भस्म, कान्तलोह, सुवर्णभस्म, मूँगा मोती और कौडीकी भस्म, सिंगरफ, राजपट्ट (रेपटी अभावमें गोदन्ती हरताल) और शुद्ध गन्धक इन सबको समान भाग लेकर सबको एकत्र खरलमें डालकर खूब बारिक चूर्ण करके चीते और आकके क्वाथमें खूब खरल करके ३ दिनतक लघुपुटमें पकावे । इसी प्रकार क्रमसे बिजौरेनींबूका रस, त्रिफला, चीता, अमलवेत, भाँगरा, कनेर और अदरख इन प्रत्येक औषधिके स्वरस व क्वाथमें ३-३ दिनतक भावना देकर लघुपुटमें पकावे । फिर स्वांग शीतल होनेपर औषधको निकालकर बारीक चूर्ण कर लेवे ॥ ७१-७५ ॥
वातपित्तकफोत्क्लेशाञ्ज्वरान्समर्दितानपि ।
सन्निपातं निहन्त्याशु सर्वाङ्गैकाङ्गमारुतान् ॥ ७६ ॥
सेवितश्च सितायुक्तो मागधीररसा युतः ।
मधुकार्द्रकसंयुक्तस्तद्व्याधिहरणौषधैः ॥ ७७ ॥
सेवितो हन्ति रोगिणां व्याधिवारणकेसरी ।
क्षयमेकादशविधं शोथं पाण्डुं कृमिं जयेत् ॥ ७८ ॥
कासं पञ्चविधं श्वास मेहं मेदो महोदरम् ।
अश्मरीं शर्करां शूलं प्लीहगुल्मं हलीमकम् ।
सर्वव्याधिहरो बल्यो वृष्यो मेध्यो रसायनः ॥ ७९ ॥
इसको दो रत्तीप्रमाण लेकर मिश्री, पीपलका चूर्ण, शहद और अदरख इनके साथ मिलाकर अथवा यथादोषानुसार अनुपानाेंके साथ सेवन करे । यह क्षयकेसरीरस वात, पित्त और कफके उत्पन्न हुए ज्वर, सन्निपात ज्वर, सर्वांगवात, एकांगवात, ग्यारह प्रकारका क्षय, सूजन, पाण्डु, कृमि, पाँच प्रकारकी खाँसी, श्वास, प्रमेह, मेद, जलोदर, पथरी, शर्करा, शूल, प्लीहा, गुल्म, हलीमक आदि सम्पूर्ण व्याधियोंको नष्ट करता है । यह सब रोगनाशक तथा बल, वीर्य और मेधा शक्तिकी वृद्धि करनेवाला और अत्युत्तम रसायन है ॥ ७६-७९ ॥