भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४८१

रसेन्द्रगुटिका ।

कर्षं शुद्धरसेन्द्रस्य स्वरसेन जयार्द्रयोः ।
शिलायां खल्वयेत्तावद्यावत्पिण्डं घनं भवेत् ॥ ८० ॥
जलकणाकाकमाचीरसाभ्यां भावयेत्पुनः ।
सौगन्धिकपलं भृङ्गस्वसेन सुभावितम् ॥ ८१ ॥
चूर्णितं रससंयुक्तमजाक्षीरपलद्वये ।
खल्लितं घनपिण्डं तु गुटीः स्विन्नकलायवत् ॥ ८२ ॥
कृत्वा--

शोधित पारेकी भस्मको १ कर्ष लेकर एक उत्तम पत्थरके खरलमें डालकर जयंती और अदरखके स्वरसमें तबतक मर्दन करे जबतक कि उसका पिण्डसा न बनजाय । फिर उसको जलपीपल और मकोयके स्वरसमें पृथक् पृथक् उत्तम प्रकारसे भावना देवे । पश्चात् इसी प्रकार भाँगरके स्वरसमें भावना दियाहुआ शुद्ध गन्धकका चूर्ण चार तोले लेकर पारेके साथ खरल करके दोनोंकी कज्जली बनालेवे । फिर उस कज्जलीको ८ तोले बकरीके दूधके साथ खरल करके सीजे हुए मटरके दानेकी समान गोलियाँ बनालेवे ॥ ८०-८२ ॥

—ऽऽदौ शिवमभ्यर्च्य द्विजादीन्परितोष्य च ।
जीर्णान्ने भक्षयेदेकां क्षीरमांसरसाशनः ॥ ८३ ॥
सर्वरूपं क्षयं कासं रक्तपित्तमरोचकम् ।
अपि वैद्यशतैस्त्यक्तमम्लपित्तं नियच्छति ॥ ८४ ॥

प्रथम शिवजी महाराजका पूजन कर और ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट करके प्रतिदिन इसकी एक एक गोली भोजनके जीर्ण होनेपर सेवन करे । इसपर दूध और मांस-रसका पथ्य करे । इसके सेवनसे सर्व प्रकारका क्षय, खाँसी, रक्तपित्त और अरुचि ये सब उपद्रव और जिसको सैकडों वैद्योंने त्याग दिया हो ऐसा अम्लपित्तरोगभी शीघ्र नष्ट होता है ॥ ८३ ॥ ८४ ॥

बृहद्रसेन्द्रगुटिका ।

कुमार्य्या त्रिफलाचूर्णैश्चित्रकस्य रसैः क्रमात् ।
शोधयित्वा पुना राजीगृहधूमहरिद्रया ॥ ८५ ॥
पक्वेष्टकारजोभिश्च धूर्त्तपत्ररसेन च ।
शृङ्गवेररसेनापि शोधयित्वा पुनःपुनः ॥ ८६ ॥

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