भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८८ भैषज्यरत्नावली । [यक्ष्मरोग-
पिष्ट्वा तेन मुखं रुद्ध्वा मृद्भाण्डे तां निरोधयेत् ।
शुष्कं गजपुटे पाच्यं चूर्णयेत्स्वाङ्गशीतलम् ॥ २३ ॥
रसो राजमृगांकोऽयं चतुर्गुञ्जं क्षयापहः ।
दशपिप्पलिकैः क्षौद्रैर्मरिचैकोनविंशकैः ॥
सघृतैर्दापयेद्वातपित्तश्लेष्मोद्द्भवे क्षये ॥ २४ ॥
शुद्ध पारेकी भस्म ३ तोले, स्वर्णभस्म एक तोला, ताम्रभस्म एक तोला, (किसी किसी ग्रन्थमें 'मृतताम्रस्य' के स्थानमें 'मृततारस्य' ऐसा पाठ है ।) शिलाजीत २ तोले, हरतालकी भस्म २ तोले और शुद्ध गन्धक २ तोले इन सबको एकत्र बारीक पीसकर १ बडी कौडीके भीतर भरदेवे और उसके मुखको बकरीके दूधके साथ घिसे हुए सुहागेसे बन्द करदेवे । फिर उसको मूषायन्त्रमें वा एक मिट्टीके बरतनमें रख ऊपरसे कपरोटी करके धूपमें सुखालेवे । फिर गजपुटमें रखकर पकावे । जब पककर स्वांगशीतल होजाय तब औषध निकालकर चूर्ण करलेवे । यह राजमृगांकनाशक रस है । इसको दो रत्तीसे लेकर चार रत्तीतक दस पीपलोंके चूर्ण और शहदके साथ अथवा १९ काली मिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ मिलाकर सेवन करावे । यह रस-वात पित्त और कफ इन तीनों दोषोंसे उत्पन्न हुए क्षयरोगमें विशेष उपयोगी है । क्षयरोगको नष्ट करनेके लिये यह परमोत्कृष्ट औषध है॥२१-२४
महामृगांकरस।
निरुत्थभस्म सौवर्णं द्विगुणं भस्मसूतकम् ।
त्रिगुणं भस्म मुक्तोत्थं शुकपुच्छं चतुर्गुणम् ॥ २५ ॥
मृतताप्यं च पंचांशं तारभस्म चतुर्गुणम् ।
सप्तभागं प्रवालं च रसतुल्यं च टङ्कणम् ॥ २६ ॥
सर्वमेकत्र सम्मर्द्य त्रिदिनं निम्बुवारिणा ।
तत्ततो गोलकं कृत्वा शोषयित्वा खरातपे ॥ २७ ॥
लवणैः पात्रमापूर्य तन्मध्ये गोलकं क्षिपेत् ।
तन्मुखं च मृदा रुद्धा पचेद्यामचतुष्टयम् ॥ २८ ॥
आकृष्य चूर्णयेच्छुद्धं चतुःषष्टिविभागतः ।
वज्रं च तदभावे तु वैक्रान्तं षोडशांशिकम् ॥ २९ ॥