भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४८७


सर्वं तद्गोलकं कृत्वा काञ्जिकेन च पेषयेत् ।
भाण्डे लवणपूर्णेऽथ पचेद्यामचतुष्टयम् ॥
मृगांकसंज्ञः स ज्ञेयो रोगराजनिषूदनः ॥ १६ ॥

शुद्ध पारा १ तोला, स्वर्णभस्म १ तोला, मोतिकी भस्म २ तोले, शुद्ध गन्धक २ तोले, और सुहागा ३ मासे सबको एकत्र काँजीके द्वारा खरल करके गोलासा बनाकर धूपमें सुखालेवे । फिर गोलेको मूषायन्त्रमें बन्द करके नमकसे भरेहुए पात्रमें रखकर चार प्रहरतक पकावे । यह मृगाङ्कनामवाला रस रोगराज क्षयको नष्ट करनेवाला है ॥ १६-१६

गुञ्जाचतुष्टयं चास्य मरिचैः सह भक्षयेत् ।
पिप्पलीदशकैर्वाथ मधुना लेहयेद् बुधः ॥ १७ ॥
पथ्यं सुलघुमांसेन प्रायशोऽस्य प्रयोजयेत् ।
दध्याजं गव्यतकं वामांसमाजं प्रयोजयेत् ॥ १८ ॥
व्यञ्जनैर्घृतपक्वैश्च नातिक्षारैरहिङ्गुभिः ।
एलाजाजीमरीचैस्तु संस्कृतैरविदाहिभिः ॥ १९ ॥
वृन्ताकं तैलबिल्वादि कारवेल्लं च वर्जयेत् ।
स्त्रियं परिहरेद्दूरे कोपं चापि परित्यजेत् ॥ १२० ॥

इस रसको ४ रत्ती प्रमाण लेकर मिरचोंके चूर्ण और शहदके साथ अथवा १० पीपलोंके चूर्ण और शहदके साथ मिलाकर सेवन करे । इसपर लघुंपाकी मांस बकरीका दही, गौका मट्ठा, बकरेका मांस, और घृतके द्वारा बने हुए विविध प्रकारके व्यंजनादि पथ्य हैं । एवं इलायची, जीरा और काली मिरच इनके द्वारा संस्कार किये हुए खाद्य पदार्थोंको भक्षण करे और अत्यन्त क्षार पदार्थ, हींग, दाहकारक पदार्थ, बैंगन, तैल, बेल, करेला आदि पदार्थोंको त्यागदेवे । स्त्रीप्रसंग और क्रोधको तो सर्वथा त्याग देना चाहिये ॥ १७-१२० ॥

राजमृगांक रस ।

रसभस्म त्रयो भागा भागैकं हेमभस्मकम् ।
मृतताम्रस्य भागैक शिलातालकगन्धकम् ॥ २१ ॥
प्रतिभागद्वयं शुद्धमेकीकृत्य विचूर्णयेत् ।
वराटिका तेन पूर्य्या अजाक्षीरेण टङ्कणम् ॥ २२ ॥