भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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४८६ भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग-

कस्तूरिका लवङ्गं च जातिकोषैलवालुकम् । प्रत्येकं बिन्दुमात्रं च सर्वं संमर्द्य यत्नतः ॥ ११० ॥ कन्यानीरेण सम्मर्द्य केशराजरसेन च । अजाक्षीरेण सम्भाव्य प्रत्येकं दिवसत्रयम् ॥ चतुर्गुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ १११ ॥

सुवर्णभस्म, रससिन्दूर, मोतीकी भस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, मूंगेकी भस्म, वैक्रान्तकी भस्म, चाँदीकी भस्म, ताँबेकी भस्म, वङ्गभस्म, कस्तूरी, लौंग, जावित्री और एलुआ इन प्रत्येक औषधिको समान भाग लेकर सबको एकत्र घीग्वारके रसके साथ उत्तम प्रकारसे खरल करके कुकुरभाँगरेके रस और बकरीके दूधके साथ पृथक् पृथक् तीन दिनतक भावना देकर चार चार रत्तीकी गोलियां बनालेवे ॥ ९-१११ ॥

अनुपानं प्रयोक्तव्यं यथादोषानुसारतः ॥ १२ ॥ क्षयं हन्ति तथा कासं यक्ष्माणं श्वासमेव च । प्रमेहान् विंशतिं चैव दोषत्रयसमुद्भवान् ॥ सर्वरोग निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ १३ ॥

यह रस यथादोषानुसार अनुपानके साथ सेवन करनेसे क्षय, खाँसी, राजयक्ष्मा, श्वास, कफ-वात-पित्तादि तीनों दोषोंसे उत्पन्न बीसों प्रकारके प्रमेह और अन्यान्य सर्व प्रकारके रोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है जैसे सूर्य अन्धकारको॥११२॥११३॥

स्वल्पमृगाङ्करस ।

रसभस्म हेमभस्म तुल्यं गुञ्जाद्वयं भजेत् । दोषं बुद्ध्वानुपानेन मृगाङ्कोऽयं क्षयापहः ॥ १४ ॥

शुद्ध पारेकी भस्म और सुवर्णभस्म इन दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र खरल करलेवे । इसको वातादिदोषोंका विचार कर अनुपानोंके साथ दो दो रत्तीप्रमाण सेवन करनेसे यह मृगाङ्करस-क्षयरोगको नष्ट करता है ॥ १४ ॥

मृगाङ्करस ।

स्याद्रसेन समं हेम मौक्तिकं द्विगुणं ततः । गन्धकं च समं तेन रसपादं तु टङ्कणम् ॥ १५ ॥