भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ]भाषाटीकासहिता ।४८५

खरल कर गोलासा बनालेवे । फिर उसके ऊपर गोबरमिली मिट्टीका लेप करके उसको नमकसे भरेहुए पात्रमें रखकर एक रात्रिपर्यन्त मृदुपुटके द्वारा पकावे । इस प्रकार यह कुमुदेश्वररस सिद्ध होता है । इस रसको दो दो रत्ती प्रमाण लेकर काली-मिर्चोंके चूर्ण और घृतके साथ मिलाकर सेवन करे । यह रस राजयक्ष्मारोगको शमन करनेके लिये परमोत्तम है ॥ १०३ ॥

काञ्चनाभ्ररस ।

काञ्चनं रससिन्दूरं मौक्तिकं लौहमभ्रकम् ।
विद्रुमं चाभया तारं कस्तूरी च मनःशिला ॥ १०४ ॥
प्रत्येकं बिन्दुमात्रं च सर्वं सम्मर्द्य यत्नतः ।
वारिणा वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः ॥ १०५ ॥
अनुपानं प्रयोक्तव्यं यथादोषानुसारतः ।
क्षयं हन्ति तथा कासं श्लेष्मपित्तसमुद्भवम् ॥ १०६ ॥
प्रमेहं विविधं चैव दोषत्रयसमुत्थितम् ।
कफजान् वातजान्रोगांनाशयेत्सद्य एव हि ॥ १०७ ॥
बलवृद्धिं वीर्यवृद्धिं लिङ्गदार्ढ्यं करोति च ।
श्रीकरः पुष्टिजननो नानारोगनिषूदनः ॥
गहनानन्दनाथोक्तो रसोऽयं काञ्चनाभ्रकः ॥ १०८ ॥

सुवर्णभस्म, रससिंदूर, मोतीकी भस्म, लोहभस्म, अभ्रककी भस्म, मूंगेकी भस्म, हरड, चाँदीकी भस्म, कस्तूरी और शुद्ध मैनसिल इन सबके समान भाग जलके साथ खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इस रसको प्रतिदिन एक एक गोली यथादोषानुसार अनुपानके साथ सेवन करे तो यह क्षयरोग, खाँसी, कफ-पित्तजनित विकार, तीनों दोषोंसे उत्पन्न हुए विविध प्रकारके प्रमेह और कफ-वातसम्बन्धी सम्पूर्ण रोगोंको तत्काल नष्ट करता है । एवं बल, वीर्यकी वृद्धि और लिङ्गको दृढ करता है । यह काञ्चनाभ्ररस कान्तिवर्द्धक, पुष्टिकारक और विविध प्रकारके रोगोंको नष्ट करनेवाला है ॥ १०४-८ ॥

बृहत्काञ्चनाभ्ररस ।

काञ्चनं रससिन्दूरं मौक्तिकं लौहमभ्रकम् ।
विद्रुमं मृतवैक्रान्तं तारं ताम्रं च वङ्गकम् ॥ १ ॥