भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 535, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५०३
३२ तोले, खाँड २०० तोले और दारचीनी, इलायची, तेजपात, केशर ये प्रत्येक दो दो तोले बारीक चूर्णकर मिलादेवे । इसको प्रतिदिन अग्निका बलाबल विचारकर उपयुक्त मात्रासे सेवन करे । इस अमृतप्राश घृतको अश्विनीकुमारोंने निर्माण किया है । इसको सेवन करते समय दूध और मांसरसका पथ्य करे । यह घृत रक्तपित्त, क्षतक्षय, तृषा, अरुचि, श्वास, खाँसी, वमन, मूर्च्छा, शरीरका टूटना, मूत्रकृच्छ्र और ज्वरको नष्ट करनेवाला एवं बल और स्त्रियोंमें रतिशक्तिवर्द्धक है ॥ २०७-२११ ॥
महाचन्दनादितैल ।
चन्दनं शालपर्णी च पृश्निपर्णी निदिग्धिका ।
बृहती गोक्षुरं चैव मुद्गपर्णी विदारिका ॥ १२ ॥
अश्वगन्धा माषपर्णी तथाऽऽमलकमेव च ।
शिरीषं पद्मकोशीरं सरलं नागकेशरम् ॥ १३ ॥
प्रसारणी तथा मूर्वा प्रियंगूत्पलवालकम् ।
वाट्यालकं चातिबला मृणालं विषशालुकम् ॥ १४ ॥
पञ्चाशत्पलमेतेषां श्वेतवाट्यालकं तथा ।
जलद्रोणे विपक्तव्यं ग्राह्यं पादावशेषितम् ॥ १५ ॥
लालचन्दन, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बडीकटेरी, गोखुरू, मुगवन, विदारी-कन्द, असगन्ध, मषवन, आमले, शिरसकी छाल, पद्माख, खस, सरलधूप, नागकेशर, प्रसारिणी, मूर्वा, फूलप्रियंगू, कुमुद, नीलोफर, सुगन्धवाला, खिरैंटी, कंघी, कमलकी नाल, भसीडा और सफेद खिरैंटी इन सब ओषधियोंको पचास पल लेकर ११ सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे ॥ १२-१५ ॥
अजाक्षीरं तैलसमं शतमूलीरसाढके ।
लाक्षारसं काञ्जिकं च दधिमस्तु तथैव च ॥ १६ ॥
हरिणच्छागशशकमांसानां च पृथक् पृथक् ।
चतुःप्रस्थं विनिष्क्वाथ्याढकं तैलं विपाचयेत् ॥ १७ ॥
श्रीखण्डागुरुकक्कोलंनखं शैलेयकेशरम् ।
पत्रं चोचं मृणालं च हरिद्रे शारिवाद्वयम् ॥ १८ ॥