भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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५०४ : भैषज्यरत्नावली । [ यक्ष्मरोग-

रक्तोत्पलं नतं कुष्ठं त्रिफला च परूषकम् ।
मूर्वा च ग्रन्थिपर्णी च नलिका देवदारु च ॥ १९ ॥
सरलं पद्मकोशीरं धातकी बिल्वपेशिका ।
रसाञ्जनं मुस्तकं च शह्नकं बालकं वचा ॥ २० ॥
मञ्जिष्ठा लोध्रमधुरी जीवनीयं प्रियङ्गुकम् ।
शठेयेला कुंकुमं चैवखट्टाशी पद्मकेशरम् ॥ २१ ॥
रास्ना च जातीकोषं च विश्वकं सधनीयकम् ।
पलार्द्धमेषां प्रत्येकं पेषयित्वा विनिक्षिपेत् ॥ २२ ॥

फिर उस क्वाथमें बकरीका दूध ८ सेर, तिलका तैल ८ सेर शतावरका रस ८ सेर, लाखका रस ८ सेर, काँजी ८ सेर, दहीका तोड ८ सेर, एवं हिरन, बकरा और खरगोश-इन प्रत्येकका मां Bibliotheque -> मांसरस आठ आठ सेर और कल्कके लिये सफेद चन्दन; अगर, कङ्कोल, नख ( नाम गन्धद्रव्य ), भूरिछरीला, नागकेशर, तेजपात, दारचीनी, कमलकी नाल, हल्दी, दारुहल्दी, उसवा, अनन्तमूल, लालकमल, तगर, कूठ, त्रिफला, फालसे, मूर्वा, ग्रन्थिपर्णी, नलिका, देवदारु, धूपसरल, पद्माख, खस, धायके फूल, बेलगिरी, रसौंत, नागरमोथा, शिलारस, सुगन्धवाला, वच, मंजीठ, लोध, सौंफ, जीवनीयगणकी समस्त ओषधियाँ, फूलप्रियंगु, कचूर, छोटी इलायची, केशर, खट्टासी, कमलकेशर, रायसन, जायफल, सोंठ और धनियाँ दो दो तोले बारीक चूर्ण करके डालदेवे और फिर यथाविधि तैलको पकावे । जब तैल उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर छानलेवे ॥ १६-२२ ॥

महासुगन्धितैलस्य गन्धमत्र प्रदीयते ।
काश्मीरमदचन्द्रांशुसिद्धे पूते विनिक्षिपेत् ॥ २३ ॥
यथालाभं शुभे पात्रे संगोपेन निधापयेत् ।
वातपित्तहरं वृष्यं धातुपुष्टिकरं परम् ॥
निहन्ति क्षीणमत्युग्रं रक्तपित्तमुरःक्षतम् ॥ २४ ॥
येषां भूरिपरिश्रमादनुदिनं नश्यन्ति देहा नृणां
ये वा कामकलानुकूलतरुणीसङ्गेन निर्धातवः ।
ये वा व्याधिविशीर्णतामुपगतास्तेषां परं भेषजं
बल्यं वृष्यतमं तनूपचयकृच्छ्रीचन्दनाद्यं महत् ॥ २५ ॥