भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६७६

इस तैलमें महासुगन्धितैलकी सुगन्धित औषधियाँ एवं कस्तूरी, केशर और कपूर ये जितनी मिलसके उतनी लेकर डालदेवे और तैलको शुद्ध पात्रमें भरकर और उसका मुँह बाँधकर रखदेवे । यह तैल वात-पित्तनाशक, अत्यन्त वीर्यवर्द्धक, धातु-पुष्टिकारक एवं अतिप्रबल क्षय, रक्तपित्त और उरःक्षतको नष्ट करनेवाला है । जिन मनुष्योंके प्रतिदिन अधिक परिश्रम करनेसे शरीर क्षीण होगय हों या जो कामकला-ओंमें प्रवीण तरुणी-स्त्रियोंके साथ अत्यन्त प्रसङ्ग करनेसे धातुहीन होगये हों अथवा जो रोगोंके कारण अत्यन्त कृश होगये हों ऐसे पुरुषोंके लिये यह महाचन्दनादि तैल अत्युत्तम औषध है । एवं अत्यन्त बलकारक, वीर्यवर्द्धक और शरीरको पुष्ट करनेवाला है ॥ २३-२५ ॥

यक्ष्मारोगमें पथ्य ।

मद्यानि जाङ्गलं पक्षिमृगमांसं विशुष्यताम् । मुद्गषष्टिक-
गोधूमयवशाल्यादयो हिताः ॥ २६ ॥ दोषाधिकस्य
बलिनो मृदुशुद्धिरादौ गोधूममुद्गचणकारुणशालयश्च ।
छागादिमांसनवनीतपयोघृतानि क्रव्यादमांसमपि जाङ्ग-
लजा रसाश्च ॥ २७ ॥ पक्वानि मोचपनसाम्रफलानि
धात्रीखर्जूरपौष्करपरूषकनारिकेलम् । शोभाञ्जनं च
कुलकं नवतालशस्यं द्राक्षाफलानि मिषयोऽपि च
माणिमन्थम् ॥ २८ ॥ सिंहास्यपत्रमपि गोमहिषीघृतं
च छागाश्रये शयनमूत्रपुरीषलेपः । मत्स्यण्डिका
शिखरिणी मदिरा रसाला कर्पूरकं मृगमदः सितचन्दनं
च ॥ २९ ॥ अभ्यञ्जनानि सुरभीण्यनुलेपनानि
स्नानानि वेषरचनान्यवगाहनानि । हर्म्यं स्रजं
स्मरकथा मृदुगन्धवाहो गीतानि नृत्यमपि चन्द्ररुची
विपञ्ची । मुक्तामणिप्रचुरभूषणधारणं च होमः प्रदान-
ममरद्विजपूजनानि ॥ २३० ॥

मदिरा, जाङ्गलदेशके पशु पक्षियोंका शुष्क मांस, मूँग, सांठीक चावल, गहू, जौ और शालिधानोंके चावल आदि पदार्थ यक्ष्मारोगीके हितकर हैं । दोषोंकी अधिकतावाले बलवान् रोगीके प्रथम मृदुवमन और विरेचनके द्वारा कोष्ठको शुद्ध करे । फिर गेहूँ, मूँग, चने, लाल शालिधानोंके चावल, बकरेका मांस,